logo
India Free Classifieds

प्रेम विवाह असफल अथवा दुखद क्यों होते हैं ?

प्रेम विवाह की असफलता के ऊर्जा समीकरण 
~~~~~~~~~
प्रेम विवाह की अवधारणा पृथ्वी की सभी मानव जातियों ,समुदायों में रही है और आधुनिक काल में यह बहुत अधिक बढ़ गयी है |पूर्व से ही पारिवारिक सहमति से विवाह की अपेक्षा प्रेम विवाह अधिक असफल होता रहा है जो आज के समय में 95 प्रतिशत तक दुखद अथवा असफलता की स्थिति तक आ पहुंचा है |प्रेम विवाह अधिकतर प्रेम अथवा शारीरिक आकर्षण या स्वार्थ आधारित होता है जहाँ शुद्ध प्रेम की मात्रा मात्र एक प्रतिशत में ही होती हैं |99 प्रतिशत मामलों में शारीरिक आकर्षण अथवा स्वार्थ ही होता है |प्रेम हो अथवा स्वार्थ असफलता से इनका कोई सम्बन्ध नहीं ,बस प्रेम रहने पर सहन की शक्ति बढ़ जाने के कारण लोग जैसे तैसे निभाते जाते हैं किन्तु जहाँ भी थोडा भी स्वार्थ होता है सम्बन्ध असफल हो जाते हैं |पाश्चात्य देशों सहित भारत में भी प्रेम विवाह की असफलता में समान सी स्थिति होती है जिसमे स्वभावगत अथवा वैयक्तित कारणों के अतिरिक्त कुछ पारिवारिक और सामाजिक उर्जागत कारण भी होते हैं जिन्हें अक्सर लोग या तो नहीं जानते या नकार देते हैं |पाश्चात्य देशों की स्थिति तो भिन्न होती है किन्तु भारत में कुछ गंभीर स्थानीय उर्जाओं का प्रभाव सम्बन्धों पर पड़ता है जो सम्बन्धों के स्थायित्व पर गहरा प्रभाव डालते हैं |शोध के अनुसार पाश्चात्य देशों में एक स्त्री जीवन में औसत सात से आठ पुरुषों के साथ सम्बन्ध बनाती है जो भारत में बहुत कम प्रतिशत में होता है |इसका कारण सम्बन्धो का स्थायित्व और उर्जाओं का सहयोग रहा है |प्रेम विवाह की अवधारणा और शारीरिक स्वार्थ इस प्रतिशत को बिगाड़ जरुर रहे हैं किन्तु आज भी भारत में प्रतिशत बहुत कम है और स्थायित्व अधिक है |
           भारत में विवाह हेतु कुल -गोत्र और पारिवारिक सम्बन्धों के साथ बुजुर्गों की सहमती के साथ उनका परिक्षण प्रमुख रहा है |इसके साथ ही ग्रह ,नक्षत्र के तालमेल से मिले विवाह मुहूर्त सहित वैदिक मंत्र और पूजन पद्धति के साथ मन्त्रों की शक्तियों से सम्बन्धों को स्थायित्व दिए जाने के कारण यहाँ वैवाहिक स्थायित्व अधिक रहा है जबकि पाश्चात्य देशों में यह न होने से पूर्व से ही वहां स्थायित्व का अनुपात बहुत कम रहा है |इस स्थायित्व के साथ ही संतुष्टि भी जुडी होती है ,अधिक स्थायित्व तो अधिक संतुष्टि और अधिक विश्वास |फलस्वरूप अधिक सफलता |ग्रह -नक्षत्रों के तालमेल से बना मुहूर्त ,पूजन पद्धति और मान्त्रिक शक्ति से सम्बन्ध की स्थिरता की कामना से एक विशेष ऊर्जा उत्पन्न होती है |यह सब प्रकृति और ब्रह्माण्ड की ऊर्जा संरचना के अनुरूप संयोजित होने से स्थायित्व में सहायक होते हैं |इसके बाद सम्बन्धों को सबसे अधिक स्थायित्व देने का कार्य कुलदेवता /देवी और पितरों करते हैं ,जिसके बारे में बहुतायत लोग जानते ही नहीं |यह वे शक्तियाँ हैं जो किसी को किसी कुल में स्वीकार्य अथवा अस्वीकार्य बनाती हैं |कितने ही शुभ मुहूर्त अथवा शक्तिशाली मन्त्रों से विवाह हुआ हो यदि कुलदेव /देवी और पितरों ने स्वीकार नहीं किया किसी को तो वह उस परिवार में टिक नहीं पायेगा क्योंकि पूजा और मंत्र की शक्ति कुलदेवता के द्वारा ही ईष्ट या सम्बन्धित शक्ति तक पहुँचती है ,सीधे स्वीकार्यता नहीं होती |यह प्रकृति की ऊर्जा संरचना का नियम है और इसी कारण किसी भी ईश्वर या शक्ति की आराधना में उसके अंग देवता ,सहायक भैरव और गण भी पूजे जाते हैं |इन सबकी पूजा कुलदेवता /देवी द्वारा ही इन तक पहुंचाई जाती है जो देवताओं और मनुष्य के बीच एक कड़ी होते हैं |
               भारत में जब कुलों और वंशों की उत्पत्ति हुई तो जो स्थानीय शक्ति उनके अधिक अनुकूल थी उसे कुलदेवता या देवी के रूप में स्थान दे पूजित किया जाने लगा क्योंकि पूजन की ऊर्जा उसी रूप में सीधे उच्च ऊर्जा तक नहीं पहुँचती यह हमारे पूर्वज ऋषि -मुनि जानते थे |यह कुछ वैसा ही होता है जैसे अमेरिका का व्यक्ति डालर उपयोग कर सकता है भारतीय रूपया नहीं अतः रूपया एक्सचेंज करना होता है ,कुछ ऐसी ही प्रक्रिया कुलदेवता और विश्वदेव की होती है |कुलदेवता पूजन को बदल ईष्ट योग्य बनाते हैं जबकी विश्वदेव दिए गए पदार्थ को बदल कर पितरों की तृप्ति योग्य पदार्थों या उर्जाओं में बदलकर उनकी योनी में उन्हें पहुंचाते हैं |कुलदेवता और विश्वदेव साथ होते हैं |कुलदेवता /देवी की असंतुष्टि से यह सब बाधित हो जाता है साथ ही पित्र भी रुष्ट हो जाते हैं क्योंकि कुलदेवता उनके आराध्य रहे हैं जिनकी कुल्ररक्षा में मुख्य भूमिका रही है |कुलदेवता की प्रकृति कुल और वंश के अनुसार निश्चित होती है जिससे वह अनुकूल व्यक्ति को ही स्वीकार करते हैं अपने द्वारा रक्षित कुल में और कोई कुल की ऊर्जा संरचना के अनुकूल नहीं हुआ तो उसे अस्वीकार कर देते हैं तथा उसकी पूजा नहीं लेते न ही उसकी सुरक्षा करते हैं |हर जाति ,वंश और गोत्र के अलग कुलदेवता होते हैं और कुलदेवता कोई मनुष्य या प्रेत शक्ति नहीं होते ,न ही यह पूर्वज हैं |यह विशेष प्रकार की पृथ्वी की स्थानीय ऊर्जा है जिसकी परिकल्पना कुलदेवी /देवता रूप में करके उन्हें अपने कुल अनुसार जोड़ा गया होता है |इन शक्तियों में आपसी अनुकूलता और प्रतिकूलता होती हैं जिससे किसी शक्ति से यह सहयोगात्मक होती हैं तो किसी शक्ति से यह टकराती हैं भले वह किसी के कुलदेवता /देवी हों |
               अधिकतर प्रेम विवाह में होता यह है की प्रेम विवाह वाले जोड़े के पुरुष के कुलदेवता यदि स्त्री को अपने द्वारा रक्षित कुल के अनुकूल ऊर्जा संरचना का नहीं पाते तो उसे अस्वीकार कर देते हैं और उसकी पूजा नहीं लेते तथा सुरक्षा नहीं करते |सम्बन्धित पुरुष से भी वह रुष्ट हो जाते हैं |उसे अस्वीकार तो नहीं करते किन्तु रुष्ट होने से उसकी भी सुरक्षा नहीं करते |यह स्थिति उत्पन्न होने पर पित्र स्वयमेव एक तो इस कारण क्रोधित हो जाते हैं की कुलदेवता ने साथ छोड़ दिया दूसरे वह प्रतिकूल स्त्री को कुल में लाने से बाधाएं उत्पन्न करने लगते हैं जिससे जीवन में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं |प्रेम की हवा निकलने लगती है और अक्सर सम्बन्ध असफल हो जाते हैं |कन्या की स्थिति थोड़ी भिन्न होती है ,उसे दोहरी मार झेलनी होती है |एक तो उसके पिता के कुलदेवता /देवी विवाह के साथ ही साथ छोड़ देते हैं दुसरे उसके पिता से सम्बन्धित पित्र आत्माएं खानदान के मर्यादा अनुकूल व्यवहार न करने से क्रोधित हो हानि का प्रयास करते हैं |इसके बाद जिससे उसने प्रेम विवाह किया उस पुरुष के कुलदेवता उसे अपने अनुकूल न पाने से अस्वीकार कर देते हैं और पित्र भी अलग परंपरा और वंश की होने से अपने अनुकूल नहीं मानते तथा विघ्न जीवन में उत्पन्न करते हैं |अक्सर स्त्री को अधिक कष्ट उठाने पड़ जाते हैं तथा जीवन कठिन हो जाता है |
            इस प्रेम विवाह के सम्बन्ध का परिणाम यह होता है की यह दम्पति कुलदेवता /देवी की सुरक्षा से विहीन हो जाता है जिससे किसी भी तरह की नकारात्मक उर्जा उसे प्रभावित कर सकती है और विभिन्न बाधाएं -कष्ट दे सकती है |इस पीढ़ी में तुरंत तो नहीं किन्तु तीसरी पीढ़ी से पित्र दोष कुंडली में दिखती है अथवा कालसर्प योग आदि अशुभ योग पीढ़ियों में उत्पन्न होने लगते हैं |बहुत से ऐसे दम्पत्तियों की संतानों में कमियां उत्पन्न हो जाती हैं जिनमे शारीरिक अंगों की कम क्रियाशीलता ,विकलांगता अथवा मानसिक बुद्धि का कम विकास देखने में आता है |हम इस विषय पर लगभग २० वर्षों से अध्ययन कर रहे और उपाय खोज रहे ,कारण खोज रहे ,कुलदेवता /देवी तथा पित्र पर अनुसंधान कर रहे और हमने पाया है की प्रेम विवाह कुलदेवता /देवी तथा पित्र दोनों को रुष्ट और निर्लिप्त कर देता है |ऐसे लोगों में यदि तालमेल उर्जाओं का बन गया तो जीवन ठीक रहता है किन्तु यह प्रतिशत मात्र १ अथवा २ प्रतिशत ही होता है |अधिकतर का प्रेम सम्बन्ध असफल ही हो जाता है अथवा यदि सम्बन्ध प्रेम वश बचा भी रह गया तो जीवन दुखद और संघर्षपूर्ण हो जाता है |संतान योग्य नहीं होती अथवा कमियों वाली होती है |जीवन बाधायुक्त होता है तथा अक्सर विभिन्न उर्जायें -शक्तियाँ -अवरोध परेशान करते हैं |उपयुक्त उन्नति नहीं होती अथवा यदि भाग्यवश उन्नति हो भी गयी और धन की कमी नहीं रही तो भी शान्ति -संतुष्टि नहीं होती तथा अंतिम समय बेहद कष्टकारक हो जाता है |
             प्रेम विवाह के मामले में स्वजातीय को कम समस्या होती है चूंकि ऊर्जा समीकरण का टकराव कम होता है या नहीं होता ,पित्र भी असंतुष्ट नहीं होते किन्तु विजातीय सम्बन्ध में ऊर्जा समीकरण का टकराव हो जाता है तथा कुलदेवता /देवी तो साथ छोड़ते ही हैं पित्र गंभीर कष्ट देते हैं |चूंकि जीवन में कठिनाइयाँ बढती है और मानसिक तनाव देती हैं यथार्थ स्थिति प्रेम भी कम कर देता है |विपरीत ऊर्जा समीकरण तालमेल में व्यवधान तो देते ही हैं नकारात्मक उर्जाओं के बेरोकटोक प्रभावित करने से चारित्रिक और दुर्व्यसन दोष भी उत्पन्न हो सकते हैं जिससे सम्बन्ध टूटने लगते हैं |किसी द्वारा किया गया तांत्रिक अभिचार ,टोना -टोटका बिना रोक टोक प्रभावित करता ही है ,कोई भी बाहरी या वायव्य शक्ति सीधे प्रभावित करती है |पुरुष से तो कुलदेवता /देवी जुड़े होते हैं किन्तु स्त्री की उनकी पूजा में संलिप्तता वह स्वीकार नहीं करते तथा उसकी पूजा नहीं लेते |स्थिति अगली पीढ़ी में अधिक विषम हो जाती है जबकि पुत्रों से कुलदेवता पूजा ही नहीं लेते ,पित्र बाधाएं उत्पन्न करते हैं तथा मांगलिक कार्यों -जीवन की उन्नति -शान्ति में विघ्न पड़ते हैं |पितरों द्वारा श्राद्ध न लेने से और कुलदेवता द्वारा साथ न देने से ईष्ट कृपा में कमी तो आती ही है कोई भी पूजा -पाठ ठीक से फलित नहीं होता |पित्र शान्ति के प्रयास असफल होते हैं |पतन का प्रारम्भ हो जाता है और अंततः सामाजिक यश छिन्न भिन्न हो जाता है |प्रेम विवाह की सफलता में स्पष्ट प्रत्यक्ष तीन कारण ही बाधक बनते हैं कुलदेवता /देवी ,पित्र और नकारात्मक शक्तियाँ किन्तु इनके कारण अनेक बाधाएं उत्पन्न होती हैं जो अंततः सम्बन्ध असफल कर देती हैं |

More News & Articles

ज्योतिष ज्ञान

img

पुत्र प्राप्ति यन्त्र

रविवार के दिन सर्पाक्षी के पत्तो से युक्त डाली लाकर एक...

Click here
img

कुन्डली रहस्य

पंचम भाव में शनि मंगल लग्नेष के साथ हो तो...

Click here
img

संतान का लिंग बताता है चीनी कैलेंडर

मनचाही संतान प्रापित के लिए सवरोदय विज्ञान का...

Click here
img

रत्नों की जांच कैसे हो

कभी भी ज्योतिष की सलाह के बिना रत्न धारण नहीं...

Click here
img

रूद्राक्ष के प्रयोग

यदि मन्त्र षकित (विधान) के साथ धारण किया...

Click here
img

ग्रह दान वस्तु चक्रम

टीका-साधु, ब्रáणों और भूखों को भोजन कराने...

Click here
img

मंगली दोश के उपाय

जातक के लग्न में अषुभ मंगल होने से मंगली दोश बनता हो तो जातक को...

Click here

Can ask any question