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शनि से भी अधिक हानिकारक है राहु-केतु की महादशा

छाया ग्रह राहु-केतु का यूं तो अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन ज्योतिष शास्त्र इसे शनि ग्रह की मारक दशाओं से भी अधिक हानिकारक मानता है। ऐसा इसलिए क्योंकि शनि न्यायपूर्ण हैं और केवल व्यक्ति के कर्मों के अनुसार उसे फल देते हैं, जबकि राहु-केतु पापी ग्रह माने जाते हैं जिसकी छाया पड़ने मात्र से व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
 
छाया ग्रह-इसलिए बहुत जरूरी है कि इसके प्रभाव शुरु होने से पहले ही बचने के उपाय कर लिए जाएं। ऐसा ना करना जीवन को दयनीय स्थितियों में पहुंचा सकता है।
 
राहु-केतु के प्रभाव-
 
अपना अस्तित्व ना होने के कारण कुंडली में राहु-केतु का प्रभाव अन्य ग्रहों की स्थितियों के आधार पर ही होता है, लेकिन इसकी महादशाएं व्यक्ति के लिए बेहद कष्टकारक होती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बुद्धि का ग्रह माने जाते हैं, इसलिए इसके प्रभावों से व्यक्ति के साथ जो भी बुरा होता है उसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार होता है।
 
शनि के दंड का हिस्सा-
 
ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों ही ग्रहों को शनि का अनुचर माना गया है, इसलिए कुंडली में राहु-केतु की युति और पापी प्रभाव आना भी व्यक्ति के बुरे कर्मों के दंड स्वरूप शनिदेव के न्याय का हिस्सा होता है। शारीरिक रूप से पीड़ित करने के अलावा यह व्यक्ति को मानसिक आघात देता है और सामाजिक मान-सम्मान में भी क्षति पहुंचाता है।
 
कुंडली में राहु-केतु की दशााएं-
 
कुंडली देखकर व्यक्ति के जीवन में राहु-केतु की दशाओं और महादशाओं के बारे में जाना जा सकता है, लेकिन डेली लाइफ में भी आपको इससे पीड़ित होने के कई लक्षण मिलते हैं। इन्हें पहचानकर इनसे बचने के उपाय करते हुए आप इसके कष्टों से बच सकते हैं। आगे हम इसकी चर्चा कर रहे हैं।
 
शरीर में राहु-केतु का स्थान-
 
शरीर में राहु को ‘सिर’ और केतु को ‘धड़’ का प्रतीक माना गया है। कुंडली में पापी राहु गले और उससे ऊपर के हिस्से यानि कि सिर को प्रभावित करता है। इससे प्रभावित व्यक्तियों को वात, कफ जैसी परेशानियां होती हैं।
 
राहु-केतु का प्रभाव-
 
वहीं केतु की बुरी दशा व्यक्ति को गले से नीचे के हिस्सों यानि सिर के अलावा शरीर के अन्य हिस्सों को प्रभावित करता है। ऐसे व्यक्तियों को फेफड़े, पेट और पैरों की परेशानियां लगी रहती हैं। हालांकि राहु-केतु की शुभ दशाएं व्यक्ति को सोच परे अचानक लाभ की स्थितियां भी पैदा करती हैं।
 
राहु के शुभ-अशुभ प्रभाव-
 
कुंडली में इसकी अशुभ दशा होने पर यह आलस्य की प्रवृत्ति बढ़ाता है। बुद्धि भ्रमित होती है अर्थात व्यक्ति किसी भी चीज के लिए सही निर्णय नहीं ले पाता। अशुभ राहु सीधा तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर करता है, इसलिए ये मस्तिष्क से संबंधित बीमारियों जैसे पक्षाघात आदि का जल्दी शिकार होते हैं।
 
शुभ राहु-
 
कुंडली में शुभ राहु व्यक्ति को शक्ति संपन्न करने में बहुत बड़ा योगदान देता है। ऐसे व्यक्ति समाज में बेहद प्रभावशाली माने जाते हैं। ये बुद्धि संपन्न, वाक संपन्न यानि के बेहद प्रभावशाली वक्ता होते हैं और अपनी बुद्धि-बातों से शत्रु तक को मित्र बनाने की क्षमता रखते हैं।
 
ज्योतिष शास्त्र में इसे क्रूर ग्रह के नाम से जाना जाता है। यह व्यक्ति में तर्कशक्ति, बुद्धि, ज्ञान, दूरदर्शिता, जलन, ईर्ष्या, लोभ, बदले की भावना, छल-कपट जैसी भावों का कारक होता है। इसकी शुभता जहां व्यक्ति को आध्यात्मिकता की ओर झुकाव पैदा करती है, वहीं अशुभ राहु व्यक्ति को आपराधिक कृत्यों के लिए प्रेरित करता है।
 
इसका प्रभाव बहुत हद तक मंगल की तरह होता है। इसलिए कुंडली में राहु अशुभ होने पर यह व्यक्ति को हिंसात्मक बनाता है। ऐसे लोग गलत संगति में पड़ते हैं, जो कई बार उनके लिए घातक सिद्ध होता है।
 
यह मानसिक विकार भी पैदा करता है और इससे प्रभावित व्यक्ति कई प्रकार के गलत कामों में लिप्त होते हैं। क्योंकि यह क्रूर ग्रह माना गया है इसलिए ऐसे व्यक्ति हत्या, अपहरण, दूसरों को सताने जैसे क्रूर कामों की ओर आसानी से प्रेरित हो जाते हैं और अक्सर ऐसे आपराधिक कृत्यों से गहरे जुड़ जाते हैं।
 
केतु का अर्थ होता है ‘ध्वज’ अर्थात ऊंचाई, इसलिए कुंडली में इसकी शुभ स्थिति जातकों को जहां कॅरियर और दूसरे क्षेत्रों में सफलता देते हुए ऊंचाइयों पर पहुंचती है, वहीं इसका अशुभ होना उतना ही अधिक पतन की ओर धकेलता है।
 
उपाय-
इसमें कोई शक नहीं कि राहु-केतु हर रूप में बेहद कष्टकारक और भयभीत करने वाले हैं, लेकिन इसके लक्षणों को समझते हुए अगर दशा शुरु होते ही उपाय कर लिए जाएं तो इतने भयानक परिणाम नहीं भुगतने पड़ते। अच्छा तो और यह होगा कि कि दशाएं प्रारंभ होने से पहले ही इसके उपाय कर लिए जाएं, इससे व्यक्ति इससे थोड़ा-बहुत प्रभावित होने के अलावा लगभग इससे अप्रभावित रहता है।
 
राहु के कुप्रभावों से बचने के लिए क्या करें-
 
राहु की अशुभ दशाओं से बचने या इसके बुरे प्रभावों को कम करने के लिए शनिवार का व्रत करना हर प्रकार से लाभ देता है। व्यक्ति को हर हाल में अपने माता-पिता, गुरुजनों का अपमान करने से बचना चाहिए तथा उनकी सेवा करनी चहिए। कुष्ट रोगियों की सेवा भी इसके बुरे प्रभावों को कम करने में विशेष लाभकारी होता है।
 
इसके अलावा गरीबों तथा ब्राह्मणों को चावल खिलाना या इसका दान करना, कौव्वे को मीठी रोटी खिलाना भी लाभदायक होता है। संभव हो तो किसी गरीब की कन्या का विवाह कराएं। राहु की अशुभ दशाएं बहुत परेशान कर रही हों तो रात में तकिए के नीचे साबुत जौ रखकर सोएं और सुबह किसी जरूरतमंद को इसका दान कर दें। शनिवार को यह उपाय करें तो और भी अच्छा है।
 
शनिवार के अलावा मंगलवार का व्रत इसमें लाभकारी होता है। इसके अलावा लोहे से बनी वस्तुओं-हथियाओं, कम्बल, भूरे रंग की वस्तुओं का दान इसकी अशुभ दशाओं के प्रभाव कम करता है। मां-बाप की कुंडली में केतु दशाओं के कारण अगर संतान को कष्ट हो, तो व्यक्ति को मंदिर में जाकर कम्बल का दान करना चाहिए।
 
इसके अलावा देसी गाय की बछिया और केतु रत्नों का दान करना भी इसके अशुभ प्रभावों को दूर करता है। माता-पिता, गुरुजनों तथा संतों की सेवा इसकी शांति में भी हितकारी है।
 
मंत्र जाप-राहु-केतु छाया ग्रह हैं और मां दुर्गा को ‘छायारूपेण’ कहा गया है। इसलिए मां दुर्गा की आराधना तथा पूजा इसमें विशेष लाभ देता है। इसके अलावा दुर्गा मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय्ये विच्चै” का 108 बार जाप आपको राहु और केतु के दुष्प्रभावों से मुक्त करता है। रोजाना इस मंत्र का जाप इन पापी ग्रहों की दशाओं और महादशाओं से भी बचाता है।
 
राहु मंत्र-रात्रि के समय राहु का बीज मंत्र “ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: “ का 108 बार जाप करें। इसके अलावा रात्रि में भगवान शिव या भैरव की पूजा करना भी इसके कुप्रभावों को कम करते हैं।
 
राहु मंत्र-अगर राहु की दशाएं बहुत पीड़ित कर रही हों तो इस बीज मंत्र का 18000 बार जाप करें या किसी पंडित से कराएं। इसके अलावा घर में राहु यंत्र की स्थापना करने से भी इसकी पीड़ा कम करता है।
 
भगवान शिव की पूजा-भगवान शिव की नियमित पूजा करना राहु और केतु दोनों से बचाता है। पूरे वर्ष और श्रावण मास में सोमवार को शिवलिंग पर जलाभिषेक करने वालों को राहु-केतु के पापी प्रभावों का कभी सामना नहीं करना पड़ता या उसके जीवन में इसके प्रभाव नगण्य होते हैं।
 
*वस्त्र-राहु के लिए हल्के नीले और केतु के लिए हल्के गुलाबी वस्त्र पहनना और दान करना विशेष लाभकारी होता है। इसके अलावा सफेद मलयागिरि चंदन का टुकड़ा किसी रेशमी नीले कपड़े में लपेटकर बुधवार को गले में या बाजूबंद की तरह धारण करें।

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