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षुभ व अषुभ योग

यधपि बहुत से योग (जैसे द्विभार्या योग, संतानहीनता योग, बालारिश्ट योग, अरिश्ट योग, दरिद्रता योग, अल्पायु योग, वहन दुर्घटना योग, राजयोग, अल्पसंतति योग, विदेष यात्रा योग, मृतवत्सा योग आदि अनेक प्रकार के) होते है। सभी को कहने के लिए एक स्वंतत्र पुस्तक की आवष्यकता पड़ेगी। तथापि हम केवल कुछ प्रमुख योगों व उनके प्रमुख प्रकारों को ही मिश्रित रूप से यंहा रख रहे है। अनेक योगो के बारें में तो आप फलकथन के अंतर्गत प्रंसगवष ही पढ़ चुके है।

द्विभार्या योग :- राहू लग्न में पुरूश राषि (सिंह के अलावा) में हो अथवा 7वें भाव में सूर्य, षनि, मंगल, केतु या राहू में से कोर्इ भी दो ग्रह ( युतिदृशिट द्वारा) जुड़ जाएं तो द्विभार्या योग बनता है। (ऐसे में सप्तमेष व द्वादषेष की सिथति भी विचारनी चाहिए)। अश्टमेष सप्तमस्थ हो तो द्विभार्या योग होता है।

राजयोग :- नवमेष तथा दषमेष एकसाथ होतो राजयोग बनता है। नवमेष दषमेष का म्ग्ब्भ्।छळम् भी राजयोग बनता है। दषमेष गुरू यदि त्रिकोण में हो तो राजयोग होता है। एकादषेष, नवमेष व चन्द्र एकसाथ हो (एकादष स्थान में) तथा लग्नेष की उन पर पूर्ण दृशिट हो तो राजयोग बनता है। ( राजयोग में धन, यष, वैभव, अधिकार बढ़ते है)।

विपरीत राजयोग :- 6ठें भाव से 8वें भाव का म्ग्ब्भ्।छळम् हो जाएं। अथवा दषम भाव में 4 से अधिक ग्रह इकÎे जो जांए। या फिर सारे पापग्रह प्राय: एक ही भाव में आ जाए तो विपरित योग बनता है। इस राजयोग के भांति यदा तरक्की नही होती जाती। किन्तु बिना प्रयास के ही आकसिमक रूप से सफलता, तरक्की धन या अधिकार की प्राप्ती हो जाती है।

आडम्बरी राजयोग :- कुंडली में समस्त ग्रह अकेले बैठें हो तो भी जातक को राजयोग के समान ही फल मिलता है। किन्तु यह आडम्बरी होता है।

विधुत योग :- लाभेष परमोच्च होकर षुक्र के साथ हो लग्नेष केन्द्र में हो तो विधुत योग होता है। इसमें जातक का भाग्योदय विधुतगति से अर्थात अति द्रुतगामी होता है।

नागयोग :- पंचमेष नव मस्थ हो तथा एकादषेष चन्द्र के साथ धनभाव में हो तो नागयोग होता है। यह योग जातक को धनवान तथा भाग्यवान बनाता है।

नदी योग :- पंचम तथा एकादष भाव पापग्रह युक्त हों किन्तु द्वितियव अश्टम भाव पापग्रह से मुक्त हों तो नदी योग बनता है, जो जातक का उच्च पदाधिकारी बनाता है।

विष्वविख्यात योग :- लग्न, पंचम, सप्तम, नवम, दषम भाव षुभ ग्रहों से युक्त या दृश्ट हो तो जातक विष्व में विख्यात होता है। इसे विष्वविख्याति योग कहते है।

अधेन्द्र योग :- लग्नकुंडली में सभी ग्रह यदि पांच से ग्यारह भाव के बीच ही हों तो अधेन्द्र योग होता है। ऐसी जातक सर्वप्रिय, सुन्दर देहवाला व समाज में प्रधान होता है।

बलात्कारी योग :- उच्च का षुक्र मंगल के साथ 12वें भाव में हो तो जातक बलात्कारी होता है। भले ही वह स्त्री हो या पुरूश।

दरिद्र योग :- कैन्द्र के चारो ं भाव खाली हों अथवा सूर्य द्वितीय भाव में तथा द्वितियेषषनि वक्री हों और 2, 8, 6, 12 या 3 भाव में हों तो लाख प्रयास करने पर भी जातक दरिद्र ही रहता है।

बालारिश्ट योग :- चन्द्रमा 5, 7, 8, 12 भाव में हो तथा लग्न पापग्रहों से युत हो तो बालारिश्ट योग बनता है। अथवा चन्द्रमा 12वें भाव में क्षीण हो तथा लग्न व अश्टम में पापग्रह हों, कैन्द्र में भी कोर्इ षुभ ग्रह न हो तो भी बालारिश्ट योग बनता है। बालारिश्ट योग में जातक की मृत्यु बाल्याकाल में ही हो जाती है। अथवा बाल्यावस्था में उसे मृत्यु तुल्य कश्ट झेलना पड़ता है।

मृतवत्सा योग :- पंचमेष शश्ठ भाव में गुरू व सूर्य से युक्त हो तो जातक की पत्नी का गर्भ गिरता रहता है। अथवा मृत संतान पैदा होती है। अत: इसे मृतवत्सा योग कहते है।

छत्रभंग योग :- राहू, षनि व सूर्य में से कोर्इ भी दो ग्रह यदि दषम भाव पर निज प्रभाव ड़ालते है। और दषमेष सबल न हो तो छत्रंभग योग बनता है। जातक यदि राजा है तो राज्य से पृथक हो जाता है। अन्यथा कार्यक्षेत्रव्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयां व विघ्र आते है, तरक्की नही हो पाती।

चाण्डाल योग :- क्रूर व सौम्य ग्रह एक ही भाव में साथ हों तो चाण्डाल योग बनता है। विषेशकर गुरू-मंगल, गुरू-षनि, या गुरू-राहू साथ हों तो। इससे भाव के अच्छे फल मिलते है। तथा जातक की संगति व सोच दूशित हो जाते है।

सुनफा योग :- कुंडली में चन्द्रमा जहां हो उससे अगले भाव में (सूर्य को छोड़कर) यदि कोर्इ भी ग्रह बैठा हो तो सुनफा योग बनता है। इससे जातक का लाभ बढ़ता है। (यदि आगे बैठने वाला ग्रह सौम्य या चन्द्रमा का मित्र है तो षुभ लाभ व फल बढ़ते है। अन्यथा कुछ अपेक्षाकृत कमी आ जाती है)।

महाभाग योग :- यदि जातक दिन में जन्मा है। (प्रात: से साय: तक) तथा लग्न, सूर्य व चन्द्र विशम राषि में है। तो महाभाग योग बनता है। यदि रात में जन्मा है। (साय: के बाद प्रात: से पूर्व) तथा लग्न, सूर्य व चंद्र समराषि में है। तो भी महाभाग योग बनता है। यह सौभाग्य को बढ़ाता है।

प्रेम विवाह योग :- तृतीय, पंचम व सप्तम भाव व उनके भावेषों का परस्पर दृशिटयुतिराषि से संबध हो जाए तो जातकों (स्त्री-पुरूश) में प्रेम हो जाता है। लेकिन यदि गुरू भी इन संबधो में षामिल हो जाए तो उनका प्रेम 'प्रेम विवाह' (।ततंदहम उंततपंहम) में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन तृतीय भाव व तृतीयेष न हो, केवल पंचम, सप्तम भाव व भावेषों का ही दृशिट, युति, राषि संबध हों और गुरू भी साथ हो तो जातक प्रेम तो करता है, लेकिन जिससे प्रेम करता हेै। उससे विवाह नही करता। भले ही जातक स्त्री हो या पुरूश।

गजकेसरी योग :- लग्न या चन्द्र से गुरू केन्द्र में हो तथा केवल षुभग्रहों से दृश्टयुत हो, अस्त, नीच व षत्रु राषि में न हो तो गजकेसरी योग होता है। जो जातक को मुख्यमंत्री बनाता है। या प्रमुख बनाता है।

बुधादित्य योग :- 10वें भाव में बुध व सूर्य का योग हो। पर बुध अस्त न हो तो व्यापार में सफलता दिलाने वाला यह योग बुधादित्य योग के नाम से जाना जाता है।

पापकर्तृरी योग :- षुभ ग्रह जिस भाव में हो उसके पहले व बाद के भाव में क्रूरपापग्रह हों तो पापकर्तृरी योग बनता है। इससे बीच के भाव में बैठा हुआ ग्रह पाप प्रभाव तथा दबाव में आकर पीडि़त होता है। अत: षुभ फल कम दे पाता है, उसी भाव में षुभ ग्रह दो पापग्रहों या दो से अधिक पापग्रहों के साथ बैठे तो पापमध्य योग बनता है।

सरकारी नौकरीव्यवसाय का योग :- जन्मकुंडली में बांए हाथ पर ग्रहों की संख्या अधिक हो तो जातक नौकरी करता है। दांए हाथ पर अधिक हों तो व्यापार करता है। सामान्यत: ऐसा मेरे सुयोग्याचार्य श्री कौषिक जी का मत है। सूर्य दांए हाथ पर हों तो सरकारी नौकरी कराता है। षनि बांए हाथ पर हो तो नौकरी कराता है। 10 वें घर से षनि व सूर्य का सम्बन्ध हो जाए ( दृश्टयुतिराषि से) तो जातक प्राय: सरकारी नौकरी करता है। गुरू व बुध बैंक की नौकरी कराते है। बुध व्यापार भी कराते है। गुरू सुनार काअध्यापन कार्य भी कराता है।

विजातीय विवाह योग :- राहू 7वें भाव में हो तो जातक का विवाह प्राय: व्न्ज् व्थ् ब्।ैज् होता है। (पुरूश राषि में हो तो और भी प्रबल सम्भावनाएं होती है।)

चक्रयोग :- यदि किसी कुंडली में एक राषि से छ: राषि के बीच सभी ग्रह हों तो चक्रयोग होता है। यह जातक को मंत्री पद प्राप्त करने वाला होता है।

अनफा योग :- यदि किसी कुंडली में चन्द्रमा से पिछले भाव में कोर्इ षुभ ग्रह हों तो अनफा योग बनता है। इससे चुनाव में असफलता तथा अपने भुजाबल से यष, धन प्राप्त होता है।

भास्कर योग :- सूर्य से दूसरे भाव में बुध, बुध से 11वें भाव में चन्द्र और चन्द्र से त्रिकोण में गुरू हो तो भास्कर योग होता है। ऐसा जातक प्रखरबुद्वि, धन, यष, रूप, पराक्रम, षास्त्र ज्ञान, गणित व गंधर्व विधा का जानकार होता है।

चक्रवती योग :- यदि कुंडली के नीच ग्रह की राषि का स्वामी या उसकी उच्च राषि का स्वामी लग्न में हो या चन्द्रमा से केन्द्र (1,4,7,10) में हो तो जातक चक्रवती सम्राट या बड़ी धार्मिक गुरूनेता होता है।

कुबेर योग :- गुरू, चन्द्र, सूर्य पंचमस्थ, तृतीयस्थ व नवमस्थ हो और बलवान सिथति में भी हो तो जातक कुबेर के समान धनी व वैभवयुक्त होता है।

अविवाहितविवाह प्रतिबंधक योग :- चन्द्र पंचमस्थ हो या बलहीनअस्तपापपीडि़ता हो तथा 7वें व 12वें भाव में पापग्रह हो तो जातक कुंआरा ही रहता है। षुक्र व बुुध 7वें भाव में षुभग्रहों से दृश्ट न हों तो जातक कुंआरा रहता है। अथवा राहू व चन्द्र द्वादषस्थ हों तथा षनि व मंगल से दृश्ट हों तो जातक आजीवन कुंआरा रहता है। इसी प्रकार सप्तमेष त्रिकस्थान में हो औ 6, 8, 12 के स्वामियों में से कोर्इ सप्तम भाव में हो तब भी जातक कुंआरा रहता है। षनि व मंगल, षुक्र व चन्द्र से 180ं पर कुंडली में हो तो भी जातक कुंआरा रहता है।

पतिव्रता योग :- यदि गुरू व षुक्र सूर्य या मंगल के नवमांष में हो तो जातक एक पत्नीव्रत तथा महिला जातक पतिव्रता होती है। यदि द्वितीयेष व सप्तमेष नीच राषि में हो परन्तु सभी षुभ ग्रह कैन्द्र या त्रिकोण में हो तो स्त्री जातक पतिव्रता तथा जातक एक पत्नीव्रत वाला होता है। बुध यदि गुरू के नंवमाष में हों तो भी पतिव्रता योग होता है चन्द्रमा यदि सप्तम भाव में हो (महिला कुंडली) पाप प्रभाव में न हो तों भी स्त्री पति के लिए कुछ भी कर सकने वाली होती है।

व्यभिचारिणी योग :- कर्क लग्न में बुध तृतीयस्थ हो, तृतीय भाव, लग्न तथा चन्द्र पाप प्रभाव में हो तो स्त्री एक नम्बर की निर्लज्ज तथा व्यभिचारिणी होती है।

अरिश्टभंग योग :- षुक्लपक्ष की रात्रि का जन्म हो और छठे या 8वें भाव में चन्द्र हो तो सर्वारिश्ट नाषक योग होता है। जन्म राषि का स्वामी 1, 4, 7, 10 में सिथत हों तो भी अरिश्टनाषक योग होता है। चन्द्रमा, स्वराषि, उच्च राषि या मित्रराषि में हो तो सर्वारिश्ट नश्ट होते है। चन्द्रमा के 10 वें भाग में गुरू, 12वें में बुध, षुक्र व कुंडली के 12वें में पापग्रह हों तो भी अरिश्ट नश्ट होते है।

मूक योग :- गुरू व शश्ठेष लग्न में हो अथवा बुध व शश्ठेष की युति किसी भी भाव (विषेश कर दूसरे) में हो। अथवा कू्रर ग्रह सनिध में और चन्द्रमा पापग्रहों से युक्त हो। या कर्क, वृषिचक व मीन राषि के बुध को अमावस का चन्द्र देखता है। तो मूक योग बनता है। इस योग में जातक गूंगा होता है।

विषेश :- 8 व 12 राषि पापग्रहों से युक्त हो तथा किसी भी राषि के अंतिम अंषो में वृश राषि का चन्द्र हो तथा चन्दउ्र पर पापग्रहों की दृशिट हो तो जातक जीवन भर गूंगा रहता है।

बधिर योग :- षनि से चौथे स्थान में बुध हो तथा शश्ठेष त्रिक भावों में हो तो बधिर योग होता है। अथवा पूर्ण चन्द्र व षुक्र साथ बैठे हो तो बधिर योग बनता है। 12वें भाव में बुध-षुक्र की युति हो अथवा 3, 5, 9, 11 भावों में पापग्रह बिना षुभ ग्रहों से दृश्ट हों अथवा 6,12 भाव में बैठे शश्ठेष पर षनि की दृशिट न हो तो भी बधिर योग होता है।

अन्य प्रमुख योग :- इनके अलावा- जारज योग, मूसल योग, रज्जु योग, नल योग, सर्पयोग, गदा योग, षकट योग, पक्षी योग, श्रृंगाटक योग, हल योग, वज्र योग, यव योग, कमल योग, वापी योग, यूथ योग, षर योग, षकित योग, दण्ड योग, नौका योग, नेत्ररोगी योग, कूट योग, छत्र योग, चाप योग, समुद्र योग, गोल योग, युग योग, षूल योग, केदार योग, पाष योग, दाम योग, वीणा योग, अमल किर्ति योग, पर्वत योग, काहल योग, चामर योग, षंख योग, भेरी योग, मृंदग योग, श्रीनाथ योग, षारदा योग, मत्स्य योग, कूर्म योग, खडग योग, लक्ष्मी योग, कुसुम योग, कलानिधि योग, कल्पद्रुम योग, अधि योग, लग्नाधि योग, कुरधरा योग, केमद्रुम योग, महाराजा योग, इत्थसाल योग, धनसुख योग, इन्द्रयोग, रूचक योग, भद्रयोग, हंस योग, मालव्य योग, मरूत योग, धनी योग, दिवालिया योग, जमींदारीं योग, ससुराल से धन प्रापित योग, धन वर्शा योग, बुध योग, दुख योग, सुख योग, दत्तकपुत्र योग, संतान प्रतिबधंक योग, अल्पायु योग, दीर्घायु योग, अपुत्रा योग, बहुपत्नी योग, वन्ध्या योग, नंपुसक योग आदि बहुत से योग होते है।

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