रूद्राक्ष का विवरण

रूद्राक्ष का विवरण

रूद्राक्ष के जन्मदाता भगवान षंकर है। रूद्र का अर्थ है- षिव और अक्ष का अर्थ है- वीर्य या रक्त, अश्रु। रूद्र+अक्ष मिलकर रूद्राक्ष बना है। यह बेर के आकार का दाना होता है। यह प्राय: तीन रंगो में होता है-लाल, मिश्रित रंग और काला। यह नेपाल और मलेषिया में होता है। नेपाल का रूद्राक्ष बड़े आकार का होता है।

जब दो रूद्राक्ष एक-दूसरे ये जुड़ जाते है, तो इनको गौरीषंकर कहा जाता है। तथा तब तीन जुड़ जाते है। तो पाट कहलाते है। अर्थात षिव, पार्वती और गणेष। इस प्रकार के रूद्राक्ष कम ही मिलते है। रूद्राक्ष का वृक्ष अमरूद के वृक्ष के समान छोटा होता है। बेर या अमरूद के समान इसके पŸाों की जड़ो में हरे रूप में वह निकलता है। उस समय बहुत कच्चा होता है।

सीधी खड़ी धारियों को रूद्राक्ष का मुख कहा जाता है। जितनी धारिया होंगी, रूद्राक्ष उतने ही मुखी कहा जायेगा। यह धारिया एक से लेकर चौदह तक षुभ मानी गर्इ है। इन मुखों के अनुसार ही रूद्राक्ष का महत्व होता है। एक से लेकर चौदह मुखों तक प्रत्येक रूद्राक्ष की अपनी गरिमा महत्व और उपयोग इस प्रकार है-

एकमुखी रूद्राक्ष को साक्षात षिव ही माना गया है। इसमें स्ंवय षिव विराजते है। और इसका धारण करने वाला ब्रá-हत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है। यह दुर्लभ है।

दोमुखी रूद्राक्ष देवी देवता का स्वरूप है। इसके धारण करने से विविध पापों का नाष होता है। और धारक जीवन पर्यन्त सुखी रहता है।

तीन मुखी रूद्राक्ष अगिन का रूप होता है। वह स्त्री-हत्या का पाप क्षमा कर देने तक की क्षमता रखता है। धारक अगिन के समान तेजस्वी हो जाता है।

चतुमर्ुखी रूद्राक्ष याने चार धारी वाला रूद्राक्ष ब्रáा के समान होती है। यह नरहत्या जैसे पाप का भी नाष करता हैं।

पंचमुखी रूद्राक्ष स्ंवय महिमा वाला माना गया है। अधिकतर यह रूद्राक्ष सरलता से मिल जाता है। यह बहुतायत में होता है। इसके सम्बन्ध में कहा गया है-

पंचमुखी रूद्राक्ष स्ंवय कालागिन नामक रूद्र है। वह अभक्ष्य भक्षण और अगम्यागमन के पाप का हरण करने वाला है। इस रूद्राक्ष के धारण करते ही सब पाप मिट जाता करते है। यह अत्यन्त प्रभावषाली और महिमामय माना गया है।

छ: मुखी रूद्राक्ष में साक्षात कातिकेय विराजमान रहते है। यह ब्रáहत्या तथा अन्य पापों का मोचन मोचन करने वाला है। इस रूद्राक्ष को सदा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए। इसका स्थान यही बतलाया गया है। अन्य स्थान पर इसे धारण नही करना चाहिए।

सप्तमुखी रूद्राक्ष को भाग्यषाली कहा गया है। यह स्ंवय कामदेव का रूप है। इसको धारण करने पर चोरी आदि पापों से छुटकारा होता है। स्त्री सुख भरपूर मिलता है। इसे धारण करने वाला सित्रयों के आर्कशण का कैन्द्र बनता है। इसे वषीकरण भी होता है। मोहन तो यह स्ंवय करता है।

अश्टमुखी रूद्राक्ष विनायक देव स्वरूप माना गया है। इस को धारण करने से अन्न, रूर्इ स्वर्ण का ढेर लग जाता है। समस्त विघ्न बाधाएं मिटती है। परमपद की प्रापित होती है। इसको धारण करने से सभी लाभ व गुण प्राप्त होते है।

इसी प्रकार नौमुखी रूद्राक्ष के विशय में कहा गया है-

यह रूद्राक्ष भैरव का स्वरूप है। इसको बायीं भुजा पर बाधना चाहिए। यह योग और मोक्ष दोनो ही देने वाला है। इसको धारण करने वाला भैरव के समान बलषाली हाेंता है। प्राय: पहलवान लोग इसको धारण करते है। मल्लयुद्व में वह बराबर कुष्ती जीतते है।

दषमुखी रूद्राक्ष साक्षात भगवान है। इसके धारण से सभी दुश्ट ग्रह, पिषाच, बैताल, ब्रáराक्षस आदि का भय दूर हो जाता है। वह अत्यन्त गुणकारी और लाभदायक माना गया है।

एकादषमुखी रूद्राक्ष एकादष रूद्रों का रूप है। इसे षिखा पर धारण करने से सहस्त्र अष्वमेघ यज्ञ और षत वाजपेय यज्ञ एक लाख गाय दान करने के बराबर पुण्य का लाभ होता है। इससे फल षीघ्र प्राप्त होता है। यह पवित्र रूद्राक्ष माना गया है।

द्वादषमुखी रूद्राक्ष को कानों पर धारण करने से द्वादष आदित्य प्रसन्न होते है। अष्वमेधादि सभी यज्ञों का फल मिलता है। सींग वाले जीव, षस्त्र धारियों, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं का तनिक भी भय नही होता है। सभी प्रकार की षारीरिक, मानसिक पीड़ा मिट जाती है। रोग से मुकित प्राप्त प्राप्त होती है। और ऐष्वर्ययुक्त सुखी जीवन मिलता है। यह बड़ा षकितषाली ओर तेजस्वी रूद्राक्ष माना गया है। इसको धारण करने वाला अत्यन्त तेजस्वी और आर्कशक बन जाता हैं। सर्वत्र उसे मान-सम्मान प्राप्त होता है।

हे पुत्र! यदि त्रयोदष मुखी रूद्राक्ष उपलब्ध हो जाऐ, तो इसको धारण करने वाला कातिकेय के सम्मान हो जाता है। यह रूदाक्ष सभी अर्थ और सिद्वियों की पूर्ति करता है। इसे रसायन की सिद्वि देने वाला और सभी प्रकार का यष प्रदान करने वाला कहा जाता है। इसको धारण करने वाला सभी प्रकार के भोग्य पद्वाथों का सेवन करता है। उसकी सभी इच्छाएं स्ंवय पूरी हो जाती है। यह परम प्रतापी तेजस्वी रूद्राक्ष है।

हे वत्स! यदि चतुर्दषमुखी रूद्राक्ष प्राप्त हो जाए तो उसे सदैव मस्तक पर धारण करने वाला षिव समान हो जाता है। देवता उसकी पूजा करते है। वह परमगति को प्राप्त होता है। केवल ब्राáण ही इस रूद्राक्ष को धारण करने का अधिकारी है। यह रूद्राक्ष स्वयं भगवान षंकर धारण करते है।

मालाए इस प्रकार की होती है।

 

मोती - चंदन
स्फटिक - पुत्र जीविका
षंख - कमल
चादी - रूद्राक्ष

 

यह सभी मालाएं अ क्ष पर्यन्त अक्षरों से अभिंमनित्रत कर धारण की जाती है। इनमें 3 सूत्र होते है- सोना, चादी, ताबा, मनक्के, के छेद में सोना, दाए भाग में चादी, बाए भाग में ताबा होना चाहिए। मुख से मुख और पूछ से पूछ मिलाकर मनक्के योजित किये जाते है। इनमे छेद वाला सुत्र बáा, दाए भाग वाला षैव और बाए भाग वाला वैश्णव कहलाता है। मुख सरस्वती, पूछ गायत्री, छेद विधा है। और गाठ प्रकृति है। तथा स्वर सातिवक होने के कारण ष्वेत है। जो स्पर्ष है। वह सत और तम के मिश्रण से युक्त होने के पर पीला और राजस होने के कारण लाल है।

रूद्राक्ष की माला के द्वारा जपने से मंत्र समस्त फलों के देने वाला होते है।

रूद्राक्ष की माला भी तीन प्रकार की बतलायी गर्इ है।

रूद्राक्ष की माला एक सौ आठ मनकों की बनायें, सŸााइस मनको की बनाये ंतो श्रैश्ठ है। अन्य प्रकार की मालाएं अधम मानी गर्इ है।

माला बनाते समय यह बात ध्यान देने योग्य है, कि सभी दाने एक समान, स्वच्छ और देखने में सुन्दर हों। कोर्इ दाना खराब न हो। छोटे बडे़, असमान मनकों की माला बनाना निशेध है। माला का सूत कुंआरी कन्याओं द्वारा बुना गया हो तो वह सर्वोतम माना गया है। माला का सम्बन्ध में चारों वर्णो की माला का रंग इस प्रकार बतलाया गया है।

 

ब््राáण - ष्वेत वर्ण
क्षत्रीय - लाल वर्ण
वैष्य - (पीला) पीत वर्ण
षूद्र - काला वर्ण

 

वैसे सभी अनुश्ठानों में लाल वर्ण की माला के प्रयोग का विधान बतलाया गया है।

कार्यानुसार भी वर्ण भेद बतलाया गया है।

 

षानित कर्म - ष्वेत
वषीकरण - लाल
अभिचार कर्म - काला

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