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राजयोग

उच्चगत ग्रह से राजयोग -

यदि 3, 4 ग्रह उच्च या स्वक्षेत्र में केंन्द्रगत हों तो मनुश्य राजा होता है। राजकुलोत्पन्न राजा व अन्य कुलोत्पन्न वैभवषाली होता है।

यदि 5 या अधिक ग्रह उच्च में हों तो साधारण वंष में उत्पन्न व्यकित भी हाथी, घोड़ो व सेना से युक्त राजा होता है।

राजकुल में उत्पन्न व्यकित की कुण्डली में यदि सभी ग्रह अधिक बड़े बिम्ब वाले, अनस्त हों और पूर्वोक्त कोर्इ दुर्योग न हो तो राजा होता है।

यदि केन्द्रादि में तीन ग्रह भी उच्चगत या स्वक्षेत्री हों तो राजकुलोत्पन्न व्यकित राजसी वैभव वाले, कभी संयोगवषात राजा भी हो सकते है।

राजकुल से तात्पर्य आजकल राजनैतिक आधार वाले परिवारों सेे लेना संगत है, क्योंकि राजाओं का युग अब नहीं है।

केन्द्र में उच्चगत सूर्य, स्वक्षेत्री षनि, स्वक्षेत्री षुक्र, नवमेष दषमेष का द्वितीय में योग राजयोग कारक है, क्योंकि नेतृकुलोत्पन्न हैं।

कोर्इ एक भी ग्रह यदि अच्छे सनि में अधिक किरणों वाला, अनस्त हो, वक्री या नीच ळाी क्यों न हो तो राजसदृष बनाता है। यदि वैसे 2, 3 ग्रह हों तो राजा ही होता है। षुभ राषि नंवाष में सिथत 2, 3 ग्रह भी हों तो षाही ठाट होते है। यदि कर्इ ग्रह हों तो सचमुच छत्र चंवर वाला राजा होता है।

दिग्बली ग्रह से राजयोग -

राजवंषोत्पन्न व्यकित की कुण्डली में 2,3 ग्रह भी यदि दिग्बली हों तो विजयी राजा होता है।

यदि षनि को छोड़कर कोर्इ पांच ग्रह दिग्बली हों या 4 ही हों तो साधारण वंष में उत्पन्न होकर भी मनुश्य राजा होता है।

वर्गोत्तम लग्न या चन्द्र से राजयोग -

लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तम नंवाष में हो और उस पर चन्द्रमा को छोड़कर चार, पांच, छह ग्रहों की दृशिट हों तो मनुश्य साधारण कुलोत्पन्न होकर भी राजा होता है।

कम मात्रा में योग होने पर भी यह योग अपना फल अवष्य देता है। इस योग में चन्द्रमा की दृशिट होने पर योग भंग नही होता है। केवल चन्द्रमा को दृशिटकारक ग्रहों में नही गिनते है। इसी एक बात कोवराह ने 44 भेदों में बाट दिया है। बृहज्जातक में इस भेदविस्तार की व्यर्थता बतला चुके है।

लग्नेष नवमेष में राजयोग -

लग्नेष यदि वर्गोतम होकर नवम में हो या नवम में उच्चगत या स्वक्षत्री हो और नवमेष भी लग्न में वर्गोतर, स्वोच्चदिगत हो तो मनुश्य राजा होता है। वह सोने की पालकी में, चंवर छत्र सुक्त होकर यात्रा करने वाला होता है।

यह पाराषरीय योग है। लग्नेष व नवमेष का सािनपरिवर्तन तथा राषि बलवत्ता (स्थान बल) इसका आधार है।

केवल षुक्र से राजयोग -

लग्न में अषिवनी नक्षत्र मेंं षुक्र हो उसे तीन या अधिक ग्रह देखे तो षत्रुविजेता राजा होता है।

षुक्र यदि नीच व षत्रुराषि के अतिरिक्त, लग्नेष के साथ द्वितिय में हो तो भी राजा होता है।

बली चन्द्रमा से राजयोग -

अधिक पक्षबली चन्द्रमा को यदि कोर्इ ग्रह स्वक्षेत्री या उच्चगत होकर देखे तो साधारण कुलोत्पन्न व्यकित भी राजा (वैभवषाली) होता है।

लग्न के अलावा कैन्द्र में 4,7,10 में पूर्ण चन्द्रमा, पूर्णकानित वाला अर्थात ग्रहण, बादल, परिवेश, आदि न हों तो हाथी घोडों से युक्त राजा होता है।

मंगलकृत राजयोग -

लग्न में मंगल यदि 1, 5, 9 राषियों में हो तो और कोर्इ मित्र ग्रह उसे देखे तो मनुश्य राजा (वैभवषाली) होता है।

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