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पितृ दोष शांति के उपाय

पितृदोश के कारण

• पितरों का विधिवत श्राद्व या तर्पण न होना।
• पितरों की विस्मृति • पितरों का अपमान
• धर्म विरूद्व आचरण
• नाग की हत्या करना या कराना
• गौ हत्या या गौ का अपमान
• नदी, जल, कूप जल में मल-मूत्र विसर्जन
• कुल देवता या कुलदेवी या लोक देवता की विस्मृति
• किसी देव स्थल या तीर्थ स्थान में दुश्कर्म करना
• गुरू स्त्री या गुरू पुत्री से सभोंग करना
• वेष्यागमन करना
• षूद्र वर्ग से विवाह संबध स्थापित करना
• परिवार की सित्रयों का भ्रश्ट चरित्र होना
• भ्रूण हत्या या गर्भपात करवाना।

पितरों का विधिवत श्राद्व-तर्पण न होना

पितरों को प्रसन्न करने के लिए आहुति सहित पिंड़ दान आदि कर्म ही श्राद्व कहलाता है। श्राद्व करने से पितर प्रसन्न होते है। और वंषजो को दीर्घायु, प्रसिद्वि, बल, तेज, धन, स्त्री, पुत्र आदि प्रदान करते है। तथा तिल मिश्रित जल को पितरतीर्थ से अजुुली भर देना तर्पण कहलाता है। श्राद्व का अर्थ श्रद्वा से है। पंरतु जब जीवित माता-पिता के लिए श्रद्वा नही रही तो उनके मरने के बाद कहां। केवल खाना पूर्ति ही षेश रह गर्इ है, जिसमें तर्पण तो आजकल किया ही नही जाता है, बलिक लोग तर्पण के नाम तक से परिचित नहीं है। ऐसी सिथति में पितरप्रकोप होना स्वभाविक ही है।

पितृदोश एक नजर में

• लग्न में वृषिचक राषि का उदय होना।
• राहू-सूर्य की युति 6-8-12 भाव में, या सूर्य-केतु की युति।
• चंद्र-राहु की युति या षनि-राहु की युति।
• 7वें भाव में राहु-षनि की युति से चांडाल योग।
• 11 वें भाव में राहु या केतु या 4-9 वें स्थान में राहु या केतु-चंद्र की युति।
• राहु-गुरू की पंचम भाव में युति से चांडाल योग।
• चंद्र पर मंगल, राहु केतु, षनि की पूर्ण दृशिट।
• पंचम नीच के सूर्य-षनि नवांष में हो या उनके दानों तरफ पाप ग्रह हों।
• चंद्र, सूर्य, कालसर्प योग 4-10 स्थान में हों।
• पंचम पुत्र स्थान का स्वाामी सूर्य हो, 9-5 स्थान में क्रूर ग्रह हों।
• गुरू सिंह का हो पुत्र स्थान का स्वामी सूर्य के साथ हो।
• लग्नेष दुर्बल होकर पंचम भाव में हो और पंचमेष सूर्य के साथ युति करता हो।
• 12 वें भाव का स्वामी लग्न में, 8वें स्थान का स्वामी पंचमेष की राषि में और दषम का स्वामी अश्टम भाव में।
• लग्न में 8 स्थान पर सूर्य-षनिपंचम भाव में, पंचम का मालिक राहुके साथ, लग्न में पाप ग्रह।
• 6-10 के मालिक पंचम भाव में तथा कारक राहु से युक्त हो।
• मेश राषि से कन्या राषि तक सूर्य-राहु की युति हो तो कश्ट कम होता है।
• तुला से मीन तक सूर्य-राहु की युति से, उग्र दोश के कारण, मनुश्य को कदम-कदम पर विपतियों का सामना करना पड़ता है।

कालसर्प योग

कालसर्प योग :-

षनि की साढ़ेसाती और मंगली दोश की भांति कालसर्प योग के नाम से भी अधिकांष लोग परिचित व आंतकित होते है। किन्तु कालसर्प योग होता क्या है? यह कम ही लोंग जानतें है। यहां हम कालसर्प योग की चर्चा उसके सभी प्रकारों के साथ करेंगें।

यदि सभी ग्रह राहू और केतू के बीच के भावों में अथवा राहू व केतू के साथ हों तो कालसर्प योग होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार लग्न के प्रथम छ: भावों में राहू और बाद के छ: भावों में केतू हो तथा सभी ग्रह राहू व केतू के अन्तर्गत हों तो कालसर्प योग होता है। किन्तु यदि एक भी ग्रह राहू व केतु की पकड़ से बाहर हो अथवा राहूकेतु से युति करने वाला कोर्इ भी ग्रह राहूकेतु के अषों से एक अंष भी बाहर हो तो कालसर्प योग नही होता है।

कालसर्प योग हो तो जातक किसी आकसिमक हादसे या संतानहीनता या व्यापार में अपार घाटे को अवष्य झेलता है। और प्राय: इन्ही कारणोंं से मृत्यु के मुख में जाता है। यदि किसी राश्ट्र की कुंडली में हो तो राजा, प्रजा, देष, वनस्पति तथा अन्न आदि की उपज को नश्ट कर देता है।

'माला योग' व 'अर्धचन्द योग ' भी भी कुछ मायनों में कालसर्प से मिलते जुलते है। अत: कालसर्प योग के निर्णय में सावधानी रखनी चाहिए। वैसे तो कालसर्प योग कुल 288 प्रकार के होते है। अभी कालसर्प योग के 12 प्रकारों की चर्चा करेंगे।)

अन्नत कालसर्प योग :-

यदि लग्न में राहू और 7वें भाव में केतु हो तथा समस्त ग्रह एक से सात भावों में हो तो अन्नत कालसर्प योग होता है।

कुलिक कालसर्प योग :-

यदि लग्न के दूसरे भाव में राहू व 8वें भाव में केतू हो और सभी ग्रह 8 भाव में ही हो तो कुलिक नामक कालसर्प योग होता है।

वासुकी कालसर्प योग :-

लग्नकुंडली के तीसरे भाव में राहू और 9वें भाव में केतु यदि सब ग्रहों को अपने भीतर समेट लें तो वासुकी नामक कालसर्पयोग होता है।

षंखपाल कालसर्प योग :-

यदि राहू लग्नकुंडली के चौथें भाव में और केतु 10वें भाव में बैठकर सभी ग्रहों को अपनी पकड़ में लें लेतो षंखपाल कालसर्प योग होता है।

पदम कालसर्प योग :-

लग्नकुंडली के 5वें भाव में राहू तथा 11वें भाव में केतु हो और सब ग्रह राहू-केतु के बीच हो तो पदम नामक कालसर्प योग होता है।

महापदम कालसर्प योग :-

लग्नकुंडली के 6ठें भाव में राहू तथा 12वें भाव में केतु हो और सब ग्रह 6 से 12 भावों में हो तो महापदम कालसर्प योग होता

तक्षक कालसर्प योग :-

जब सप्तम भाव में राहू और लग्न में केतु हों तथा सभी ग्रह उनके मध्य हो तो तक्षक नामक कालसर्प योग होता है।

कर्कोटक कालसर्प योग :-

राहू लग्नकुंडली के 8वें तथा केतु दूसरे भाव में हो और सभी ग्रह राहू-केतु की पकड़ में हो तो कर्कोटक कालसर्प योग होता है।

षंखचूड कालसर्प योग :-

लग्नकुंडली के 9वें भाव में राहू व तीसरे भाव में केतु हो समस्त ग्रह उनके अंतर्गत हों तो षंखचूड कालसर्प योग होता है।

घाटक कालसर्प योग :-

लग्नकुंडली के 10वें भाव में राहू व चौथे भाव में केतु हो सभी ग्रह इनकी गिरफत में हों तो घाटक कालसर्प योग होता है।

विशधर कालसर्प : -

यदि राहू जन्मकुंडली के 11 वें भाव में तथा केतु 5वें भाव में हो और सभी ग्रह उन दोनों की पकड़ में हों तो विशधर नामक कालसर्प योग होता है।

षेशनाग कालसर्प योग :

लंग्नकुंडली के 12वें भाव में राहू तथा 6ठें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह राहू-केतु के लपेटे में हों तो षेशनाग कालसर्प योग होता

लाल किताब और पितृदोश

लाल किताब में पितर ऋण के कारक :-

लाल किताब के अनुसार पितर ऋण के निम्र कारण बताए गए है।

कुल का पुरोहित परिवर्तित करना :-

यदि कुल का पुरोहित को अपनी निजी कारणों से परिवर्तित कर दिया जाए तो उसके षाप के कारण पितृदोश होता है। कुल पुरोहित को यदि निस्संतानता के कारण परिवर्तित किया जाए तो निष्चित रूप से पितृदोश होता है।

पीपल के पेड़ को नुकसान पहुंचाना :-

यदि कोर्इ व्यकित अकारण ही किसी पीपल के वृक्ष का किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाता है तो व व्यकित पितृदोश का भागी होता है। यदि व्यकित घर में लगे हुए अथवा पड़ोस के या किसी धर्म स्थान के वृक्ष के नीचे षौच कर्म करता है। अथवा पीपल के वृक्ष के नीचे घर की गंदगी को डालता है तो उस व्यकित को अवष्य ही पितृदोश हो जाता है।

लाल किताब के अनुसार पितृदोश के लक्षण :-

यदि किसी व्यकित के पास जन्मकुंडली न हो तो इन लक्षणों से भी पितर ऋण की पहचान की जा सकती है। लाल किताबअ के अनुसार पितर ऋण के लक्षण निम्न प्रकार है-

• परिवार में अनावष्यक तनाव रहता है।
• बने-बनाए काम आखिरी समय पर बिगड़ जाते है।
• अपेक्षित परिणाम अनावष्यक विंलब से होते है।
• मांगलिक कार्य (विवाह योग्य संतानों के विवाह आदि) में, सभी परिसिथतियां अनुकूल होने पर विलंब होता है।
• भरपूर आमदनी के होते हुए भी बचत पक्ष कमजोर होता है।
• पिता-पुत्र में अनावष्यक वैचारिक मतभेद होते है।
• षरीर में अनावष्यक दर्द व भारीपन रहता है।
• यदि पितृर बंधन में हो, तो जातक के सिर में सायनस और माइग्रेन के समान दर्द रहता है।

वृद्वावस्था में दु:ख :-

यदि व्यकित को पितृदोश हो तो जब तक उसके जवानी के दिन रहते है। तब तक तो वह सम्पन्न रहता है। जैसे ही उसके बाल सफेद आने लगते है, वह विभिन्न समस्यायों से घिर जाता है

समस्त कार्यो में बाधा :-

यदि किसी व्यकित के प्रत्येक कार्यो में अवरोध आने लग जाए। बनते हुए कार्यो में अचानक व्यवधान आने लग जाए, परिवार में कलह रहने लग जाए या किसी सदस्य को ऐसा रोग हो जाए जो डाक्टरों के उपचार के बाद भी ठीक न हो पा रहा हो तो व्यकित को पितृदोश होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है।

व्यापार में नुकसान :-

यदि व्यापार में लगातार गिरावट आ रही है। पूरे प्रयास करने के बाद भी व्यापार में सिथरता न आ रही हो, माल घाटे से बैचना पड़े। गा्रहक दुकान पर रूकता न हो, बाजार में भीड़ हो लेकिन आपकी दुकान पर ग्राहक न आता हो, ये सब लक्षण पितृदोश की सम्भावना को प्रबल बनाते है।

लाल किताब में पितृर ऋण का निदान :-

लाल किताब में पितृर ऋणं का निदान इस प्रकार बताया गया है कि जब यह निषिचत हो जाए कि व्यकित को पितृर ऋण है। तो उस व्यकित को चाहिए कि किसी धर्म स्थान में एक पीपल के पेड़ को स्थापित करे एवं जब तक वह बड़ा न हों तब तक उसकी देखभाल करे। ऐसा करने से वह व्यकित पितृर ऋण से मुक्त हो जाता है, उसका रोजगार खुल जाता है, धन के आगम के रास्ते खुल ने लगते है।

पितृदोश षांति के सामान्य उपाय :-

ये पितृर दोश के सामसन्य उपाय है, जिन्हे करने से पितृर दोश दूर होता है।

• पिता का आदर करें और नित्य आर्षिवाद लें।
• तांबे के लौटे के जल में ष्वेंत अर्क के पुश्प मिलाकर नित्य उगते सूर्य को अघ्र्य दें और उस समय कम से कम 21 बार सूर्य के बीज मत्रों का जाप करे।
• पितरों के निमित घर में दीपक, अगरबत्ती करें और प्रात: पूजा के समय ऊ पितराय नम: के कम से कम 21 जाप करें।
• जहां पितरों का जाप करें, वहा एक कलष में षुद्व जल , ढक्कन से ढककर रखें और उस जल को रोज सुबह बदलें और पुराने जल को तुलसी या मनीप्लांट के पौधों में डाल दें।
• नारायण बली योग्य विद्वान से विधिपूर्वक संपन्न करांए।
• पितरों का तर्पण योग्य विद्वान से कराएं।
• भोजन करने से पहले अपने हिस्से की रोटी में से एक चौथार्इ रोटी अलग निकालें और उसे चिडि़या-गाय को खिलांए।
• अमावस्या को पितरों के नाम की धूप करें और गरीब व्यकित को यथायोग्य खाना खिलाएं।
• सवा मीटर कपड़ा लें उसके एक कोने मे सवा रूपया और एक चुटकी चावल बांधे और उस कोने में गांठ लगा दें। अब उस कपड़े में उक साबुत पानी का नारियल रखें और नारियल को उस कपड़े में बाध लें। उस कपड़े सहित नारियल को घर में सुरक्षित पवित्र स्थान में रखें।
• माघ, वैषाख, भाद्रपद माह की अमावस्या को पितरों के निमित यथायोग्य दान (कपड़े व बर्तन) करें।

उक्त उपायों से जातक की भावी पीढ़ीया पितृदोश से सदैव मुक्त रहती है।

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