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क्यों लगाते है हम तिलक ?

तिलक का अर्थ संस्कृत के तिल क्रिया से लिया गया है,जिसका अाश्य है निचोड़,निष्कर्म या थोड़े में बहुत कुछ जान लेना,आयुर्वेद शास्त्रानुशासर

मष्तिष्क में पियूष ग्रंथि होती है,जहा अमृत का वास होता है,हमारे वेदो में भी कहा गया है की तिलक दोना भोहों के बीच होना चाहिये,इससे मनुष्य के सोचने समझने की क्षमता में वृद्धि होती है,

तिलक के मुख्य रूप से दो ही तत्व विचारणीय है,देव पूजा के अतिरिक्त अन्य सभी अवसरों पर अक्षत रोली

का तिलक किया जाता है,

दूसरा -अखंडित चावल रोली के तिलक लगाये जाते है,दरअसल,रोली का लाल रंग जीवन की लालिमा का प्रतिक है,रक्त की लालिमा जीवन का प्रतिक है,स्त्रोत है,प्रेम का भी रंग लाल माना जाता है,इसे तेज़ के रूप में भी स्वीकार किया गया है

इस रोली के तिलक को प्राय अक्षत से अलंकृत किया जाता है, अक्षत यानि अखंडित चावल। चावल के सफ़ेद रंग में सत्व गुण पाया जाता है,इसे प्रकाश शीतलता तथा ज्ञान का प्रतीक माना गया है,ज्ञान के प्रकाश के बिना प्रेम ,शक्ति,तेज़ की पहचान है,इसलिये श्वेत रंग अर्थात सत्व गुण के अभाव में प्रेम मोह बन जाता है,शक्ति

 

हत्याचार बन सकती है और तेज़ आंतक का रूप धारण कर सकती है,इसलिये चावल रोली का तिलक लगाया जाता है। 

ज्योतिष ज्ञान

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