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क्या आप जानते है श्रीकृष्ण जी के पास कौनसी 16 कलाये थी?

आपने महाभारत या अन्य धार्मिक ग्रंथो में पढ़ा होगा की भगवान  श्रीकृष्ण 16 कलाओं में सम्पूर्ण थे,16 कलाओं के कारण

ही भगवान श्रीकृष्ण हर क्षेत्र में विजयी हुए छाये वो क्षेत्र मित्रता का हो ,रण  भूमि हो,और चाये बात प्रेम की हो ,भगवानश्री

कृष्ण ने अपनी इन कलाओं का प्रदर्शन किया ,तभी भगवान कृष्ण को 16 कला सम्पूर्ण कहा जाता है,क्या आप जानते है

वो 16 कलए कोनसी थी,चलो हम आपको विस्तार से उन 16 कलाओं का नाम बताते है,

 
01 - अनुग्रह -उपकार- बिना किसी लोभ की भावना से लोगो का उपकार [भला ] करना,भगवान कृष्ण जी कभी भी किसी से
कुछ पाने का लोभ नहीं रखते,जो भी भक्त इनके के पास इनका बनकर आ जाता है ,उनकी सम्पूर्ण मनोकामना पूरी करते
 
है,
 
02 -इसना -आधिपत्य -इस कला का मतलब है आदमी में उस गुण का मौजूद होना जिससे वह लोगो पर अपना प्रभाव
 
स्थापित करने में सफल होता है,और लोग उनसे प्रभावित हो जाते है,और जरूरत पड़ने पर लोगो को अपने प्रभाव का
 
अहसास दिलाते है.कृष्ण जी ने अपने जीवन में इसका कई बार प्रयोग किया उदारण। . मथुरा निवासियों को द्वारिका में
 
बसने के लिए त्यार करना,
 
03- प्रहवि-अत्यंतिक विनय - इस कला का नाम प्रहवि है,इसका अर्थ विनय होता है,भगवान श्री कृष्ण में अहंकार नहीं
 
है,ना ही ये श्रेय अपने ऊपर लेते है,सुदामा को मित्र बनाकर छाती से लगा लेते है,महाभारत युद्ध में सारा श्रेय पांडवो को दे
 
देते है,सभी विधाओं में प्रांगत है फिर भी ज्ञान प्राप्ति का श्रेय गुरु को देते है,
 
04-सत्य -- भगवान श्री कृष्ण कटु सत्य बोलने से भी परहेज़ नहीं करते है,और धर्म की रक्षा के लिये सत्य को परिभासित
 
करना भी जानते है,ये कला सिर्फ भगवान कृष्ण में है,शिशुपाल की माता ने पूछा क्या शिशुपाल का वध तुम्हारे हाथो लिखा
 
है,तो भगवान कृष्ण ने' निसंकोच कह दिया की ये तो विधि का विधान है,शिशुपाल की माँ कृष्ण की बुआ थी 
 
05 - योग - जिनका मन केंद्रित है,जिसने अपने मन को आत्मा में लीन कर लिया है वह है श्री कृष्ण इसलिए इनको
 
योगेश्वर भी कहते है,कृषणजी उच्च कोटि के योगी थे,अपने योग बल से श्री कृष्ण ने ब्रहास्त्र के प्रहार से माता के गर्भ में
 
पल रहे परीक्षित की रक्षा की,मृत गुरु पुत्र को पुनर्जीवन प्रदान किया,
 
06-क्रिया-कर्मण्यता- जिनकी इच्छा मात्र से दुनिया का हर काम हो सकता है,वह कृष्ण सामान्य मनुष्य की तरह कर्म
 
करते है,और लोगो को कर्म की प्रेरणा देते है, महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण ने भले ही हथियार नहीं उठाये लेकिन अर्जुन के
 
सारथि बनकर युद्ध का संचालन किया,
 
07 -ज्ञान - नीर क्षीर विवेक -श्रीकृष्ण ने कई बार विवेक का परिचय देते हुए समाज को नै दिशा प्रधान की,गोवर्धन पर्वत
 
की पूजा हो अथवा महाभारत युद्ध टालने  के लिये दुर्योधन से पांच गांव मांगना। यह श्री कृष्ण का उच्च स्तर का परिचय है 
 
08- श्री-धन सम्पदा -जिस व्यक्ति के पास अपार धन सम्पदा हो और वह आत्मिक रूप से भी धनवान हो,जिस के घर से
 
कोई भी खली हाथ ना जाये ,यह कला भगवान श्री कृष्ण में मौजूद है,
 
09-भू-अचल सम्पति- जिस व्यक्ति के पास पृथ्वी का राज भोगने की क्षमता हो। पृथ्वी के एक बड़े भू भाग पर जिसका
 
अधिकार हो। और उस स्थान पर रहने वाले जिसकी आज्ञाओं का सहर्ष पालन करते हो,वह अचल सम्पति का मालिक
 
होता है,भगवान श्री कृष्ण ने अपनी योग्यता से द्धारका पूरी को बसाया। इस लिए यह कला भी इनमे मौजूद है.
 
10-कीर्ति-यश प्रसिद्धि -जिसके मान सम्मान और यश की कीर्ति से चारो दिशाओं में गूंजती है,लोग जिसके प्रति स्वतः ही
 
श्रद्धा और विश्वास रखते हो वह इस कला में संपन्न होता है,भगवान श्री कृष्ण में यह कला भी मौजूद है,लोग सहर्ष ही
 
भगवान कृष्ण की सहर्ष ही जयकार करते है,
 
11-इला-वाणी की सम्मोहकता-इला का अर्थ है मोहक वाणी,भगवान श्री कृष्ण में ये कला भी मौजूद है,पुराणो में उलेख है
 
की भगवान श्री कृष्ण की वाणी सुनकर क्रोधी भी शांत हो जाते थे,मन में भक्ति की भावना भर जाती थी,जो गोपिया
 
भगवान कृष्ण की शिकायत करने आती थी वो शिकायत भूल कर तारीफ करने लग जाती थी,
 
12-लीला-आनन्द उत्सव - लीला का अर्थ है आनन्द,इनकी बाल लीला से लेकर जीवन की प्रत्येक घटनाये रोचक मोहक
 
है,इनकी लीला सुनकर कामी व्यक्ति भी भावुक हो जाता हु,इस लिये इनको लीलाधर  नाम से पुकारा जाता है,
 
13- कांति -सौंदर्य-जिनके  देखकर मन स्वतः ही आकर्षित होकर प्रशन्न हो जाता है,जिसके मुखमंडल को देखकर बार बार
 
छवि निहारने को मन करता है,भगवान राम में भी यह कला मौजूद थी,और कृष्ण भी इस कला में सम्पन थे,कृष्ण की इस
 
कला के कारण पूरा वज्र मंडल इस छवि को देखकर हर्षित होता था,गोपिया कृष्ण को देखकर काम पीड़ित हो जाती थी,और
 
पति रूप में पाने की कामना करती थी,
 
14-विद्या-बुद्धि-सातवी कला का नाम है विद्या,श्री कृष्ण में यह कला भी मौजूद थी,कृषणवेद,वेदांग के साथ साथ युद्ध और
 
संगीत कला में भी प्रांगत थे,राजनीति और कुटनीति में भी कृष्ण सिद्धहस्त थे,
 
15- विमला-पारदर्शिता- जिसके मन में किसी प्रकार का छल कपट ना हो,भगवान श्री कृष्ण सभी के प्रति समान व्यवार
 
करते है,इनके लिए ना ही कोई छोटा है और ना ही कोई बड़ा है,महारास के समय भगवान ने इसी कला का प्रदर्शन किया
 
था,इन्होने राधा और गोपियों में कोई फर्क नहीं समझा,सभी के साथ सम भाव से नृत्य किया और अबको आनंदित किया,
 
16-उतकर्षिनी-प्रेरणा - महाभारत के युद्ध के समय श्री कृष्ण ने इस कला का परिचय देते हुए युद्ध से विमुख अर्जुन को युद्ध
 
के लिये प्रेरित किया,और अधर्म पर धर्म का विजय पताका लहराया,इस कला के रूप में भगवन ने प्रेरणा को स्थान
 
दिया,जिससे की लोग उनकी बातो से प्रेरणा लेकर लक्ष्य भेदन कर सके. 

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