लक्षणविचार : सामान्य वर्ग

लक्षणविचार : सामान्य वर्ग

अंगविधा के आचार्य:

माना जाता है कि प्राचीन काल में समुद्र नामक ऋशि ने अंगविधा या षरीरलक्षण षास्त्र का प्रवर्तन किया था। उन्हीं के नाम पर आज तक भी इसे सामुदि्रक षास्त्र अर्थात समुद्रोक्त षास्त्र कहा जाता है। लेकिन समुद्र के अतिरिक्त भी कर्इ प्रवर्तक ऋशि इस षास्त्र के माने गए है। भारतीय अंगविधा केवल हथेली की रेखाओं का ही मुख्यत: विचार नही है, अपितु यह मनुश्य की सर्वागीण लक्षणपरीक्षा है। इसलिए इसे भारतीय षास्त्रों में अंगविधा या षरीरलक्षण षास्त्र या कही पर सक्षेंप में लक्षणषास्त्र भी कहा गया है। हमारी प्राचीन काल से अनवरत बह रही इस ज्ञानगंगा का पार्यवाची या समकक्ष षब्द बिल्कुल नही हो सकता है

गति (चाल) विचार :

व्यकित की षारिरिक चाल उसके भाग्य की चाल का सन्देष देती है। इस तत्व को समझने के लिए महशिर्यो ने पशुओं की चाल से मनुश्य की चाल की तुलना करके फलादेष किया है। एतदर्थ पहले जानवरों की चाल को पहचानने की आवष्यकता होगी।

1. सिंहगति :- षेर को यदि आपने चलते हुए देखा हो तो , उसकी चाल में एक खास प्रकार का धीमापन होता है। वह फुंक फुंक कर लेकिन दृढ़ता से कदम बढ़ाता है। उसके चलने की आवाज भी नही होती है। चलते समय वह दंबग गतिवाला, मानो सारी दुनिया को अपनी जेब में लेकर चलने वाला होता है। कभी-कभी गर्दन दांए बांए या पीछे भी घुमाता है, लेकिन उस घुमाने में जल्दबाजी नही होती है। ऐसे व्यकित बहुत संभलकर कदम बढ़ाते हुए ऐसे चलते है। मानो धरती को दबाकर चल रहे हों। ये प्राय: चलते समय बिल्कुल सीधी गर्दन रखकर नही चलते है। इनकी गर्दन थोड़ी सी आगेे की ओर झुकी सी रहती है। ये कनखियों से ही दांंए बांए आंखे घुमाकर, जायजा सा लेते हुए चलते है। ये 10-20 कदम चलने के बाद पीछे की ओर सावधानी से देखते चलतें है। चलते समय इनका षरीर हिलता डूलता या सावधानी से देखते डुलता या थुलथुल करता सा प्रतीत ही नही होता है। ऐसे लोग बहुत धीरे या बहुत तेज नहीं चलते है। इनकी गति स्वभाविक व दंबग होती है। इनके चलते समय पैरों या जूतों की घिसघिसाहट नही होती है। ये लोग वाहन चलाते समय भी जरूरत हों या न हों, तब भी रह रह कर पीछे देखने से बाज नही आतें। यदि एक साथ कर्इ लोग कहीं जा रहे हों तो ये मार्ग में प्राय: आगे रहने की आदत के षिकार होते है, लेकिन बहुत तेज नही भागते। अर्थात दौड़ने व चलने में सदा अन्तर रखते है। ये केवल मौज में आकर ही अपनी गति नही बढ़ाते है। इन्हे सन्तुलित गति ही पसन्द होती है। इस गति के लोग खूब सुखी व प्रतिशिठत होते है।

2. हंसगति की महिमा प्राचीन साहित्य में खूब गार्इ गर्इ है। सुन्दर नारियों व नायिकाओं की गति को रेखांकित करते हुए उसे हंसगति गजगामिनी आदि कहा जाता है। इस चाल में एक प्रकार की लय व आकर्शण होता है। नजाकत इसका विषेश स्वभाव है। ऐसे व्यकित के चलते समय छाती कुछ आगे ओर उठी सी रहती है। इस चाल में गर्दन सीधी, तनी हुर्इ सी रहती है। सुन्दर लड़कियों को सौन्दर्य विषेशज्ञाएं जब आकर्शक चाल सिखाती हैं। तो उनकी गर्दन को चलते समय भी सिथर रखने की आदत डालने के लिए सिर पर पतली चौड़ी किताब, रजिस्टर या फार्इलकवर रखकर चलाती है। इससे कन्धे व कन्धों के ऊपर वाला भाग गर्दन वगैरह सिथर रहती है। तथा षेश निचला षरीर चलने की हरकत करता रहता है। ऐसी चाल में गर्दन अकड़ी हुर्इ न होकर, सीधे, अनावष्यक रूप से न हिलने वाली तथा इधर उधर झुकी हुर्इ न होती है। इस गति में हाथों की कि्रया भी विषेश द्रश्टव्य है। हाथ एक लय में आगे पीछे रहते है, लेकिन अर्थ यह नही है कि ऐसा व्यकित परेड या पी.टी करता हुआ या चले। इस चान में विषेश त्लजीमउ होती है। हंस को आप पानी में तैरते देखें तो उसकी गर्दन नही हिलती है। वह छाती के दबाव से ही पानी का ढेलता हुआ सा प्रतीत होता है। पानी की लहरे, उसके आसपास समान गति से उठती रहती है। इसी तरह से मनुश्यों की चाल को भी समझना चाहिए। इस व्यकित के चलने से मिटटी नही उठती है। यह धरती पर बहुत दबाकर पैर नही रखता है। इसकी गर्दन की हडडी व रीढ़ सीधी रहती है। नितम्ब व इससे निचे के अंग लय के साथ हरकत करते है। तथा दोनों हाथ भी समान रूप से आगे पीछे जाते है। ऐसा नही होता कि यह व्यकित किसी एक हाथ को विषेश हिलाए तथा दूसरे को कम। इस गति के मनुश्य कोमल स्वभाव, कामुक, सुन्दर, दंबग व प्रतिशिठत तथा सुखी होते है। सिंहगति की अपेक्षा धीमा होना भी इनकी पहचान है।

3. हाथी मतवाला होकर अर्थात कामुक होकर या विषेश मस्ती भरी सिथति में जैसे चलता है। वह गति मानव की हो तो यह गजगति भी भाग्यवान लोगो की होती है। ऐसे लोग झुमते से चलते है। इनका धड़ या सिर प्राय: लय के साथ दांए व बांए झुकता या झूलता सा रहता है। इस चाल में सिंह गति की अपेक्षा कुछ कम व हंस गति की अपेक्षा अधिक षीघ्रता होती है। यदि दो बार किसी चिडि़याघर में जाकर इन पषुओं पंक्षियों को बारीकी से देखेगे तो आपको विशय अधिक स्पश्ट हो जाएगा।

4. बलवान बैल या सांड की गति तो आप अधिक स्पश्ट रूपसे समझ ही सकते है। गर्दन उठी हुर्इ, थोड़ी सी पीछे की ओर झुकी सी दिखे, चलते समय भीड़ से कुछ अलग चलें। चाल में दंबगपना व सारे संसार को जीत लेने की इच्छा दिखे। बल से गर्विला होकर चलेे। जिस तरह गजगति की विषेशता है, उसी तरह इस गति की विषेशता दंबगता श्रैश्ठता की झलक तथा स्वंय को अगुवार्इ करने वाला मानना गुण होत है। ऐसे व्यकित में मार्ग मंें दूर चलते हुए भी मंजिल के स्थान पर सबसे प्रवेष करने की विषेशता होती है। ऐसे चारों वाले व्यकित सुखी, समृद्व व ऐष्वर्ययुक्त, प्रतिशिठत होते है।

निनिदत गति :

फुदकते हुए चलना, कन्धे उचकाते हुए चलना, गर्दन का किसी एक ओर ही झुका लेना, हाथों में गतागत अर्थात आगे पीछे ले जाते हुए लय की कमी होना, टागों का दृढतपूर्वक भूमि स्पर्ष न होना, घुटनों कस आपस में टकराना या छुना, चलते समय मिटटी उठाना, षरीर के दांए या बांए भाग पर अधिक वनज रखकर चलना, चलते समय पूरा षरीर फुदकना जैसे भागते समय भैंस का षरीर ऊपर नीचे होता रहता है।

1. जिन लोगो की चाल दायीं या बायीं ओर वजन लेती है, वे लोग निनिदत होते है। इनमें भी जिनके जूते की दायीं एड़ी घिसने वाले लोग विषेश निनिदत होते है।

2. जिन लोगो के चलते समय आवाज होती है, घिस घिस अधिक हो लेकिन जूते या जमीन के कारण नही अपितु जो लोग स्वभाविक रूप स ही पैर घसीट कर चलें, वे लोग वृद्वावस्था में विषेश दु:खी होते है। इनके जीवन का आखिरी चौथार्इ भाग कश्टमय व बदनामी वाला या उपेक्षित जीवन देने वाला होता है। जब पैरों की दषान्तर्दषा आएगी तब भी यह फल अधिक होगा।

3. चलते समय मिटटी उठे तो लोग प्राय: चुगलखोर स्वभाव के होते है। मीठे बनकर आपकी बात व विचार जान लेगें व आपके विरोधी के सामने जाकर कह देगें। इन लोगों का व्यवहार मीठे जहर की तरह होता है। ये लोग विशधर से भी अधिक विशैले साबित हो सकते है।

4. अधिक तेज चलना या अति मन्द गति होना दोनों ही दुगर्ुण है। बहुत तेज चलने वाला व्यकित घमण्ड़ी, चालाक व स्ंवय को छिपाता हुआ कपटी होता है। चलते समय हाथ चील के पखों की तरह खुलें रहें तो ऐसा व्यकित बहुत क्रूर होता है। कपट व परनाष की भावना उसकी रग रग मेंं होती है। अति धीमी चलाने वाले लोग, जहां जैसी भी परिसिथत में रहें, बेचारे सतुंश्ट ही रहते हैै। ये लोग बहुत अधिक समझौतापरस्त होते है। लोगो के इषारों पर बड़ी खुषी से नाचते है।

जो लोग मन्थरगति व मस्तानी चाल से चलते है। जिनके चलते समय पैरों की आवाज नही होती, वे लोग ऐष्वर्यषाली होते है। इसके विपरीत लक्ष्मण वाले या उचक कर, डोलते से चलें या बहुत तेज चलें तो वे लोग दरिद्र होते है।

स्वर (आवाज) विचार :

आदमी की आवाज उसके गुणों की धोतक है। कहते है कि कोयल व कौए में आवाज से ही अन्तर जाना जाता है।

गम्भीर स्वर :

गम्भीर स्वर से तात्पर्य है। कि व्यकित जब अपनी बात कहना स्वभाविक रूप से षुरू करें, जब बीच में आए तथा जब समाप्त करेंं, तब तीनों सिथतियों में उल्लेखनीय उतार चढ़ाव न हो। विशय व अवसर के अनुरूप आरोह अवरोह (उतार चढाव) होना कोर्इ दुगुर्ण नहीं है। लेकिन बोलते बोलते अचानक धीमा या तेज होना दुगुर्ण है।

दुन्दुभि स्वर :

जब व्यकित के बोलने में समयानुरूप या विशयानुरूप उतार चढ़ाव आता रहें। जो आवाज दूसरों के âदय में प्रसन्नता व आकर्शण पैदा करें, यह दुन्दुभि स्वर होता है। दुन्दुभि एक प्रकार का वाध यन्त्र होता है। इसे आप नगाड़ा या भगंडे का ढ़ोल बजाने वाले लोग विषेश उतार चढ़ाव दिखाते है। वैसे ही उतार चढ़ाव, समयानुरूप इस स्वर में भी होते है। ऐसा स्वर सुनने वालों के âदय में वैसी ही भावनांए भर देता है।

सिनग्ध स्वर :

मनोभाव जैसे हर्श, विशाद, षोक, भय दीनता आदि जिस रूवर में स्पश्टतया महसूस न हों तथा सदैव मीठा व मधुर ही बना रहे तो वह स्वर सिनग्ध होता है। अपने भावों को छिपाने में समर्थ व दूसरों क कानों को प्रत्येक अवस्था में प्रिय लगने वाला यह स्वर है।

महान स्वर :

महान का अर्थ है। बड़ा, बुलन्द होना। जब कर्इ लोग बातें करें, लेतिन स्वभाविक रूप से जिसकी आवाज बुलन्द सुनार्इ दे। सारी बातें भीड़ में भी समझ आ जांए, वह स्वर महान कहलाता है।

अनुनादी स्वर :

जिस आवाज में नाद या स्वन हो तो वह स्वर अनुनादी कहाता है। मनिदर में यदि आप घंटी बजायें तो घटें की चोट से एक बार आवाज होने के बाद भी उसकी गूंज या अनुवाद देर तक सुनार्इ पड़ता है। अत: जो स्वर दूर से बोला जाने पर भी सुनार्इ पडें, जिसमें चिल्लाहट न हो और विषेश लय के साथ धीरे धीरे कम होने का गुण हो, वह स्वर अनुनादी है।

इन पाचों प्रकार के स्वरों वाला व्यकित दीर्घायु, धनी, प्रतिशिठत, विधावन, सुखी, स्त्री व पुत्रों वाला होता है।

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