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क्या है ज्योतिश़?

क्या ज्योतिश अंधविष्वास है? :-

विज्ञानवादियों एंव आधुनिक लोगों की यह आम धारणा है। कि ज्योतिश अंधविष्वास और मात्र पंडितों की कमार्इ का धंधा है। लेकिन यह भी सत्य है। कि ऐसी धारणा उन्हीं सज्जनों की है, जिन्होने ज्योतिश को पढ़ा या जाना है, मात्र सुना है। किसी प्रणाली को जाने व समझे बिना ही उसका विरोध इसलिए करना कि वह प्राचीन है। अथवा आध्यातिमकता से सम्बनिधत है, बुद्विमत्ता से सम्बधित नही है। दो पद्वाथोंसत्ताओंंविशयों को तत्वत: जानकर उनके सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही हम तुलना कर सकते है। तभी हम किसी को श्रैश्ठ ओर किसी को औसत या निम्न कहने के अधिकारी है। मात्र इसलिए नही कि वह हमें पंसद है या हमारी रूचि के अनुकूल नही है। सत्य हमेषा हमारी पंसद का ही होए यह जरूरी नही है।

ज्योतिश के सम्बन्ध में भ्रानितंया और उनके कारण :-

किसी भी भ्रानित कारण 'ज्ञेयता' या 'समग्र दृशिट' का अभाव होता है। ज्योतिश के विरोधी ही मात्र भ्रानितंयो के षिकार नही है। अपितु ज्योतिश के पक्षधरसमर्थक या इसे प्रयोग करने वाले बहुत से तथाकथित ज्योतिश भी भ्रानितंयो के षिकार है। (इनमे मेरे परिचित कुछ ऐसे विद्वान भी षामिल है जो 25-30 वर्शो से इसी विशय से गहनता से जुडे़ होने का दम भरते है)। अत: आगे बढ़ने से पूर्व इन भ्रानितंयो का, इनके कारणो तथा निवारणोंं का भी प्रयास करना युकितसंगत होगा। साथ ही जिज्ञासु पाठकों का ज्ञानवर्धन एवं संषय हरण होने के साथ-साथ इस विशय (ज्योतिश) को ठीक-ठीक समझ सकने के लिए सषक्त भूमिका एवं सुदृढ़ धरातल भी प्राप्त हो सकेगा।

अत: यह विवेचन सम्पूर्ण पुस्तक से अधिक महत्वपूर्ण और उपयोगी होगा। इसे नजरअंदाज करने की लापरवाही ना करे।

विरोध में भ्रानितंया :-

• ज्योतिश अंधविष्वासनिराधार है।
• ज्योतिश मात्र कर्मकाण्ड अथवा 'पंड़ो' की आजिविका का साधन है। अन्यथा जीवन में उपयोगी नही।
• ज्योतिश कपोल कल्पना है। अथवा ठगने की विधा है।

पक्ष में भ्रानितंया :-

• ज्योतिश मात्र ग्रहोें की गतियों का गणित है।
• ज्योतिश र्इष्वर का प्रकाष है अत: परिपूर्ण एंव दोशरहित है।
• ज्योतिश द्वारा पूर्व निषिचत भाग्य को बदला जा सकता है।
• ज्योतिश एक स्वतन्त्र विज्ञान है। और ज्योतिश सर्वज्ञ होता है।

दोंनो प्रकार की भ्रानितंयो के मूल कारण :-

• 'समग्र दृशिट' का अभाव। किसी अंग विषेश को ही सम्पूर्ण मान लेने का भ्रम। दूसरे षब्दों में अज्ञान एंव अर्धज्ञान।
• केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानना। अतिसूक्ष्म, मापे तथा देखे न जा सकने वाले घटकों के असितत्व को स्वीकार न करना।
• पुनर्जन्म की मान्यता के प्रति अविष्वास।
• कालान्तर में होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान न देना तथा प्राचीन सिद्वांतो, उद्वरणों, संज्ञाओं को आज के परिप्रेक्ष्य में ज्यों का त्यों तोलने की कोषिष करना।
• ज्योतिश का दर्षन षास्त्र, तर्क षास्त्र आदि से पृथक र्इष्वर प्रदत्त, ऋशियों का प्रसाद मानकर सम्पूर्ण या असंषोधनीय समझना।
• कर्मफल के बन्धन को तत्वत: न जानना अथवा कर्म के स्वरूप या कार्य और कारण के सम्बन्ध को न समझ पाना।
• विशय को जाने और समझे बिना ही अपनी रूचि या अरूचि के आधार पर 'पूर्वाग्रह' या 'हठधर्मिता' से काम लेना। उसका निश्पता के साथ विवेचन न करना।
• षब्द के मात्र षब्दार्थ पर ही विचार करना। उसके भावार्थ, गूढ़ार्थ, प्रचलित अर्थ एंव पर्याय अर्र्थो पर विचार न करना।
• यह मानना कि हर पुरानी चीज बदल दी जानी चाहिए।

खगोल व ज्योतिशीय तथ्य

जन्मराषि व नक्षत्रनक्षत्रों के नामाक्षर :-

जन्मराषि :-

जातक की जन्म राषि का अर्थ है कि उसके जन्म के समय चन्द्रमा किस राषि में था। इसी तरह जातक के जन्म नक्षत्र का अर्थ है। कि उसके जन्म के समय चन्द्रमा आकाष के किस भाग में था।

प्रत्येक नक्षत्र के चारभाग होते है। हर चरण का एक वर्णअक्षर होता है। अत: प्रत्येक नक्षत्र के अंतर्गत चार वर्णअक्षर आते है। (एक राषि में सवा दो नक्षत्र होते है। यानी नक्षत्रों के नौ चरण होते है। दो नक्षत्रों के 4+4¾8 चरण तथा तीसरे नक्षत्र का एक चरण। अत: सवा दो नक्षत्र यानी 9 चरण हुए। इसलिए एक राषि के अन्तर्गत 9 वर्ण या अक्षर आते है। यहां नक्षत्रों के अक्षर बताए जा रहें है- )

नक्षत्रों के चरणाक्षर

पंचाग व समय

कैसे जन्म तिथि?

चन्द्रमा के रेखांष को घटा लें। जो आए उसे 12 भाग दे दें। यदि 1 से 15 के बीच परिणाम आए तो षुक्लपक्ष, 16 से 30 तक हे हो तो कृश्ण पक्ष समझें।

सूत्र - चन्द्र-सूर्य /12 = तिथि अथवा M-S/12 = तिथी

विषेश :- यंहा ध्यान रखें कि 12ं का अन्तर बढ़ने पर तिथी परिवर्तित होती है। किन्तु 12ं का यह अन्तर सदा एक निषिचत अवधि में ही बढ़ेगाघटेगा, ऐसा कोर्इ सिद्वांत नही बनाया जा सकता। क्योंकि चन्द्र की गति (आकाषीय) सदा एक जैसी नही रहती है। वह घटती-बढ़ती रहती है। यंहा तक कि 12ं का अन्तर कभी चन्द्र 19 घंटे 59 मिनट में काटता है। ता कभी यह अन्तर काटने में उसे 26 घंटे 49 मिनट का समय भी लग जाता है। इसी अन्तर के कारण एक दिवस में एक ही तिथी नही रह पाती। कभी एक दिवस में दो या डेढ़ तिथी बढ़ जाती है। तो कभी घट भी जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय पंचाग षास्त्र उस तिथी को दिवस की तिथी मानता है, जो सूर्योदय के समय चल रही हो। भले ही वह सूर्योदय के तुरन्त बाद ही समाप्त हो जाए।

तिथि क्षय एवं तिथि वृद्वि :- अत: यदि आज सूर्योदय के समय द्वितीया चल रही है। तो द्वितीया ही आज की तिथी मानी जाएगी। यदि सूर्योदय के बाद तृतीया षुरू हो गर्इ है तो भी आज द्वितीया ही मानेंगे और यदि यही द्वितिया कल सूर्योदय के समय भी रहे तो कल भी द्वितीया कल सूर्योदय के समय भी रहे तो कल भी द्वितिया ही मानेंगे। इसके विपरीत यदि आज सूर्योदय के समय द्वितिया है। और सूर्योदय के बाद द्वितिया खत्म होकर तृतीया आ गर्इ जो कि कल के सूर्योदय के समय चतुर्थी तिथी चलती हुर्इ हो तो आज द्वितिया और कल चतुर्थी मानी जाएगी। तृतीया का क्षय मान लिया जाएगा।

इस प्रकार वृद्वि तथा क्षय की व्यवस्था करके राषियों को 15 दिनों में (एकपक्ष में) ही पूर्ण करते है। सूर्योदय के समय की तिथी ही दिवस की तिथि मानी जाती है। अगले दिन सूर्योदय पर भी वही तिथी हो तो उसे तिथि वृद्वि कहा जाता है। तथा अगले दिन सूर्योदय के समय तक दो तिथियां सरक चुकी हों तो एक तिथि का क्षय मानकर सूर्योदय से पूर्व वाली तिथि को क्षय तिथि कहा जाता है। वृद्वि हो अथवा क्षय- एकपक्ष में 15 तिथियां पूर्ण हो जाती है।

करण :- तिथि का अर्ध भाग करण कहलाता है। अत: 30 तिथियों के 60 करण होते है। तिथि द्वारा चन्द्रबिम्ब के 15 वें भाग की कमीबेषी दिखाते है। तिथि, वार, एवं नक्षत्र की भांति करण तथा योग आम आदमी के लिए बहुत उपयोगी नही है। परन्तु मुहूर्त आदि देखने में इनका विषेश महत्व रहता है।

कारणों की संख्या 11 मानी गर्इ है। 1. बव करण, 2. बालव करण, 3. कौलव करण, 4. तैतिल करण, 5. वणिज करण, 6. गज करण, 7. विशिट करण, 8. षकुनि करण, 9. चतुश्पद करण, 10. नाग करण, 11. किंस्तुघ्र करण।

इन 11 कारणों में प्रथम 7 की पूरे मास की तिथियों में पुनरावृति होती है। जबकि अंतिम 4 चरण मास में केवल 1 बार ही आते है। इनमें विशिट करण को भद्रा भी कहा जाता है।

तिथि संज्ञाएं :-

• नन्दा तिथियां 1,6,12
• भद्रा तिथियां 2,7,11
• जया तिथियां 3,8,13
• रिक्ता तिथियां 4,9,14
• पूर्णा तिथियां 5,10,15

इनमें पूर्णा तिथियां विषेश षुभ तथा रिक्ता तिथियां अच्छे कार्यो के आरम्भ के लिए अषुभ मानी जाती है।

अमावस्या तीन प्रकार की होती है-

• सिनीवाली - प्रात: काल से रात्रि तक रहने वाली।
• दर्ष - चतुर्दषी से बिद्व अमावस्या।
• कुहू - प्रतिपदा से युक्त अमावस्या।

तिथियों के स्वामी :- प्रतिपदा-अगिन, द्वितिया-ब्रह्राा, तृतीया-पार्वती, चतुर्थी-गणपति, पंचमी-सर्प,शश्टी-कार्तिकेय,सप्तमी-सूर्य,अश्टमी-षिव,नवमी-दुर्गा,दषमी-काल, एकादषी-विष्वदेव, द्वादषी-विश्णु, त्रयादषी-कामदेव, चतुर्दषी-षंकर, पूर्णिमा-चन्द्रमा, अमावस-पितर।

योग :- योगो की संख्या भी 27 है। क्याेंकि एक योग भी 13-20 अथवा 800 मिनट का होता है। और एक नक्षत्र की ही भांति योग के भी चार चरण या भाग होते है। अत: 1 चरण 3ं 20 अथवा 200 मिनट होता है। (एक राषि सवा दो नक्षत्र या 30 की है। यानी एक राषि 800 + 800 + 200 ¾ 1800 मिनट की होती है) मिनट का अर्थ कला है।

सूर्य व चन्द्र के स्पश्ट स्थानों को जोड़कर उनकी कलांएमिनट बनाकर उन्हे 800 से भाग देने पर मत योगों की संख्या निकल आती है। जो षेश बचता है। उससे पता चलता है। कि वर्तमान योग की कितनी कलांएमिनट बीत गए है। षेश को 800 में से घटाने पर वर्तमान गम्य कलांए ज्ञात हो जाती है। इस प्रकार योग ज्ञात करते है।

योग ज्ञात करना :- दूसरे षब्दों में योग ज्ञात करने का सूत्र इस प्रकार बनता है।

सूत्र - सूर्य रेखांष + चन्द्र रेखांष » 800 ¾ योग

यानी सूर्य स्पश्ट व चन्द्र को जोड़कर 800 से भाग दें। सक्षेंप में कहें तो ै़डध्800

नक्षत्र ज्ञात करना :- जबकि नक्षत्र ज्ञान केवल चन्द्र रेखांष से होता है। इसमे चन्द्र रेखांष के मिनटकलांए बनाकर 800 से भाग देने पर नक्षत्र संख्या आ जाती है। अत: सूत्र बना - चन्द्र रेखांष » 800 ¾ नक्षत्र संख्या।

27 योगो के नाम इस प्रकार है- 1. विश्कुंभ 2. प्रीति 3. आयुश्मान 4. सौभाग्य 5. षोभन 6. अतिगण्ड 7. सुकर्मा 8. धृति 9. षूल 10. गण्ड 11. वृद्वि 12. ध्रुव 13. व्याघात 14. हर्शण 15. वज्र 16. सिद्वि 17. व्यतीपात 18. वरीयान 19. परिघ 20. षिव 21. सिद्व 22. साध्य 23. षुभ 24. षुक्लषुक्र तथा 25. ब्रह्रा 26. ऐन्द्रइन्द्र 27. वैधृति।

नाम के अनुसार ही योगो का फल कहा जाता है। ये समस्त योग सूर्य व चन्द्र के पारस्परिक सम्बन्ध से बनते है। इनके अलावा वार तथा नक्षत्र के योग से आन्नद, काल, दण्ड आदि 28 योग और भी बनते है।

कालगणना :- पंचाग कालगणना पर ही आधारित है। अत: कालगणना की सूक्ष्म एंव इकाइयो से पाठको का परिचित करवा देना भी उपयुक्त होगा। कालगणना के विशय में भारत जैसी सूक्ष्म व्यवस्था पूरे विष्व में कही और नही मिलती।

ज्योतिशीय महत्व की :-

3 लव ¾ निमेश, 3 निमेश ¾ 1 क्षण
5 क्षण ¾ काश्ठा, 15 काश्ठा ¾1 लघु
15 लघु ¾1 घड़ी (24 मिनट ¾ 1 घड़ी)
2 घड़ी ¾ 1 मुहूर्त, 60 घड़ी ¾ 1 दिन रात
(1 घट़ा ¾ 2,12 घड़ी, 1 मिनट ¾ 2,12 पल)
30 दिन रात (दिवस) ¾ 1 सौर मास
2 पक्ष (षुक्ल व कृश्ण) ¾ 1 चन्द्र मास
2 मास ¾ 1 ऋतु
3 ऋतु ¾ 1 अयन
2 अयन ¾ 1 वर्श

सम्पूर्ण काल गणनातालिका :-

सूक्ष्म से दीर्घतर
2 परमाणु ¾ 1 अणु
2 अणु ¾ 1 त्रसरेणु (खिड़की खोलने पर भीतर आनेवाली धूप में दिखार्इ पड़ता ़जद्दा)
3 त्रसरेणु ¾ 1 त्रुटि
100 त्रुटि ¾ 1 वेध (पत्ते को सूर्इ से बेधने में लगने वाला समय)
1 वेध ¾ 1 लव
3 लव ¾ 1 निमेश (पलक झपकाने का समय)
3 निमेश ¾ 1 क्षण
5 क्षण या 15 निमेश ¾ 1 काश्ठा
15 काश्ठा ¾ 1 लघु
2 लघु30 काश्ठा ¾ 1 कला
30 कला15 लघु ¾ 1 नाडि़कादण्ड़घड़ी (24 मिनट)
2 नाडि़का60 कला ¾ 1 मुहूर्त
6-7 नाडि़का ¾ 1 प्रहरयाम
8 प्रहरलगभग 28 मुहूर्त ¾ 1 दिन-रात (60 घड़ी)
15 दिरात ¾ 1 पक्ष
2 पक्ष ¾ एक मासपितरों का 1 दिन-रात
2 मास ¾ 1 ऋतु
3 ऋतु ¾ 1 अयन
2 अयन ¾ 1 वर्श
36 वर्श ¾ 1 पितृवर्श
360 वर्श ¾ 1 दिव्यवर्श
12000 दिव्यवर्श ¾ 1 महायुगचतुयर्ुग
कलियुग ¾ (4,32,000 वर्श मान)
द्वापर ¾ 2400 दिव्य वर्श
त्रेता ¾ 3600 दिव्य वर्श
सतयगु ¾ 4800 दिव्य वर्श
1000 चतुयर्ुग ¾ 1 ब्रह्रादिन1कल्प
71-614 चतुयर्ुग ¾ 1 मन्वन्तर
50 ब्रह्रा वर्श ¾ 1 परार्ध
100 ब्रह्रावर्श ¾ परकाल

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