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ग्रहषील विवेक

(निसर्ग मैत्री चक्र)

ग्रहों में पुरूश स्त्री विभाग

सू र्य, मंगल, बृहस्पति पुरूश ग्रह है। षुक्र व चन्द्रमा स्त्री ग्रह एवं बुध व षनि नंपुसक ग्रह है।

ग्रहों का वर्ण व जाति

गुरू, व षुक्र ब्राáणों के , सूर्य व मंगल क्षत्रीयों के, चन्द्रमा वैष्यों का एवं बुध षूद्रों का अधिपति है। षनि परम असभ्य व आपराधिक प्रवृति के लोगो का अधिपति कहा गया है।

ग्रहों में राजादि विभाग

सूर्य सभी ग्रहों में राजा, चन्द्रमा, रानी, बुध, युवराज, मंगल, सेनापति, गुरू, व षुक्र मन्त्री तथा षनि नौकर होता है। जन्म समय में जो ग्रह बलवान हो तो अपने अनुसार ही व्यकित की मनोवृति व कार्य षैली बना देता है। सूर्य चन्द्र बली हों तो मनुश्य राजसी जीवन षैली से प्रेम करने वाला व षनि बलवान हो तो मनुश्य भाग-दौड़, अधीनता, ऊपर वालों के दबाव में काम करता है। यदि बुष बली हो तो उच्छंखल राजपुत्र की तरह, मंगल हो तो साहसी व स्वतन्त्रता की चाह वाला, गुरू व षुक्र बली हो तो बहुत सोच-समझकर, षालीन व तर्कसम्मत ढ़ग से कार्य करने वाला होता है। एक स्थान पर राहु व केतु को सेवक बताया गया है। लेकिन यह सर्वसम्मत नही है। सामान्यत: राहु व केतु की बलबत्ता होने पर भी मनुश्य में अचानक आक्रामकता बढ़ती देखी गर्इ है।

पंच तत्वों का सम्बन्ध

सूर्य का अगिन तत्व, चन्द्रमा का जल तत्व है। ये दोनो आत्म रूप है।

'अगिनशोमात्मकं जगत' कह कर श्रुति भी ऐसा ही कहती है। अत: ये दोनो विषिश्ट वर्ग में आतें है। षेश मंगल, बुध, गुरू, षुक्र, षनि ये पाचों ग्रह क्रमष: अगिन तत्व, भुमि तत्व, आकाष तत्व, जल तत्व, वायु तत्व के प्रतिनिधि है।

ग्रहों की दृशिट

सभी ग्रह जिस राषि में सिथत हो, उससे सातवीं राषि को एवं उसमें सिथत ग्रहों को पूर्ण दृशिट से देखते है। चतुर्थ व अश्टम भाव को त्रिपाद अर्थात 75 : दृशिट से देखते है। तथा 5 व 9 भावों पर 50: या द्विपाद दृशिट एवं 3 व 10 भावों पर एक पाद या 25: दृशिट डालते है।

व्रकी ग्रह की फल व्यवस्था

सामान्यत: वक्री हाने पर षुभ ग्रह अधिक षुभ व पाप ग्रह अधिक पाप फल करता है। तथापि वक्री ग्रह यदि नीचगत हो तो वह षुभ फल व उच्चगत हो तो अषुभ फल ही देंता है। साधारणत: वक्री ग्रह षुभ हो या पाप, अधिक बली हो जाते है। इसी प्रकार अस्तंगत व वक्री होने पर भी मंगलादि ग्रह मिश्रित फल ही देते हेै।

ग्रहों का परस्पर सम्बन्ध

ग्रहों का परस्पर 4 प्रकार का सम्बन्ध बताया गया है।

1. जब दो ग्रह परस्पर एक दूसरे की राषि में हो, जैसे मकर में बुध व कन्या में षनि। यह सर्वाधिक बली सम्बन्ध है।

2. जब दो ग्रह किसी भी राषि में सिथत होकर एक दूसरे को पूर्ण दृशिट से देखते हों। यह पहले से कुछ कम बली सम्बन्ध है।

3. जब कोर्इ ग्रह अपनी अधिशिठत राषि के स्वामी से दृश्ट हों। जैसे मंगल मकर मेंं हो तथा षनि उसे पूर्ण दृशिट से देखें। यह तृतीय प्रकार का सम्बन्ध है। यह 2 से कम बली है।

4. जब दो ग्रह एक ही राषि में सिथत हों। यह सबसे निर्बल सम्बन्ध है।

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