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ग्रहों का रोग

रोग में विचारणीय ग्रह

- शश्ठ स्थान में सिथत ग्रह
- 8, 12 भावों में सिथत ग्रह
- शश्ठेष
- शश्ठेष के साथ युक्त या सम्बन्ध करने वाले ग्रह। अन सब का विचार करके जब दो तीन प्रकार से जो रोग प्रतीत हो, उसे ही कहें।

ग्रहों का रोगकारत्व



सूर्य के रोग इस प्रकार है-

- पित्त, पित्त बढ़ना, पेट में अम्ल, जलन, खêी डकार, षरीर पर पि त्त के चकते उभरना आदि।
- ज्वर, बुखार।
- तपन, गर्मी के रोग, लू लगना आदि, षरीर मेंं जलन होना।
- अपस्मार, मिर्गी या कोर्इ तत्सदृष रोग।
- âदय रोग, âदय की धड़कन बढ़ना, âदय धमनी में रूकावट, दर्द, आघात आदि।
- क्रोड अर्थात पेट के रोग।
- नेत्रपीड़ा
- षत्रुभय,
- त्वचा विकार, एलर्जी, खुजली, चकते, दाद, एगिजमा, चमला आदि।
- हडडी खिसकना, टूटना आदि या हडिडयों की कमजोरी। ये रोग होते है।
अनके अतिरिक्त लकड़ी, आग, हथियार, विश से उत्पन्न भय। स्त्री व पुत्र की ओर, से या उनके कारण भय या व्याधि। चौपाए जानवरों से भय। चोर, राजा, से भय। यमराज या भगवान रूद्र का प्रकोप होता है।

चन्द्रमा के रोग

चन्द्रमा आदि रोग कारक होतो ये रोग सम्भावित होते हैं।

- नींद न आना, अधिक नींद आना।
- आलस्य।
- कफविकार बलगम बनना, खांसी, जुकाम, नजला होता है।
- पतले दस्त।
- ठंड से चढ़ने वाला बुखार।
- सींग वाले पानी के जानवरों से भय।
- अपच, भूख कम लगना, अरूचि।
- स्त्री को कश्ट या स्त्री से कश्ट।
- कामिला रोग, बढ़ा पिलीया।
- मानसिक बैचेनी।
- खून से सम्बनिधत विकार।
- जल से भय।
- बलग्रहों, दुर्गा, कि™ार, यमराज, सर्पराज, यक्षिणी आदि से भय होता है।

मंगल के रोग

मंगल इन रोगो का कारक है।

- अधिक प्यास, अधिक लोभ, अधिक उतावलापन, साहस से उत्पन्न रोग।
- रक्त विकार।
- पित्त से उत्पन्न बुखार।
- अगिन से उत्पन्न रोग।
- विश, षस्त्र की पीड़ा।
- त्वचा रोग, कुश्ठ।
- नेत्र रोग।
- पेंट में या कही पर गुल्म (टयूमर) फोड़ा आदि।
- मिर्गी।
- असिथमज्जा का भय।
- कठोर भाशण, क्रोध , उत्तेजना, कामुकता से उत्पन्न रोग।
- षरीर पर चोट।
- राजा या चोर से पीड़ा।
- भार्इ, पुत्र, मित्र, से वैर या युद्व।
- राक्षस, गन्धर्व, घोर ग्रह से भय।
- धड़ में कोइ्र्र बड़ा विकार।

बुध के रोग

बुध इन रोगो का कारक है।

- बुद्वि का भ्रम।
- कठोर वचन।
- नेत्र रोग।
- गले व कारक के रोग।
- ज्वर।
- पित्त, बलगम व वायु के रोग।
- विश संक्रमण पीलिया।
- खराब सपने दिखना।
- दाद खाज।
- आग की चपेट में आना।
- वध बन्धन व मषक्कत से उत्पन्न रोग।
- गन्धर्व, पृथ्वी, महलं, वाहनों सें भय तथा ग्रहपीड़ा।

गुरू के रोग

बृहस्पति इन रोगो का कारक है।

- गुल्म (भीतरी टयूमर) ज्वर, षोक, बेहोष, कफरोग।
- कान के रोग, संज्ञा षुन्यता, षरीर सु™ा होना, पक्षाघात, लकवा आदि।
- मनिदर या देव स्थान की धन राषि का चुराने से उत्पन्न दोश।
- ब्रáण का षाप।
- कि™ार, यक्ष, देवता, नाग, विधाधरों का कोप।
- विद्वान, गुरू या उत्कृश्ट व्यकित का कोप।

षुक्र क रोग

षुक्र इन रागों का कारक है-

- पीलिया, कफरोग, वात रोग, नेत्र रोग, मधुमेह, गुप्तरोग, मूत्रदोश, काम सम्बन्धी रोग, वीर्य हानि।
- बाजारू स्त्री के सम्पर्क से उत्पन्न रोग, सूखा रोग। योगिनी, यक्षिणी, मातृका से उत्पन्न दोश। प्रियमित्र से सम्बन्ध बिगड़ने का षोक आदि।

षनि के रोग

षनि इन रागों का कारक है-

- वात कफ रोग, वायु विकार, वातरोग।
- पैरों में कश्ट।
- मुसीबत।
- उनींदापन, थकावट।
- बुद्वि विभ्रम।
- पेट के रोग।
- भीतरी गर्मी।
- नौकरों से उत्पन्न परेषानियां।
- बगलों में चोट या सहयोगियों की हानि।
- स्त्रीपुत्र की विपति।
- अंग भंग।
- âदय रोग।
- पेड़ पत्थर से चोट।
- पिषाचगण या पापी लोगो, दुश्टों या दुव्र्यसनों से पैदा होने वाले रोग।

राहु केतु के रोग

राहु इन रागों का कारक है-

- âदय रोग।
- कोढ़।
- बुद्विभ्रम।
- विशकोप।
- पैर का रोग, बनावटी अंग लगना।
- पिषाच या सर्पभय।
- स्त्रीपुत्र की विपती।

केतु के रोग इस प्रकार है-

- ब्राâाण व क्षत्रीय से विरोध।
- षत्रुभय।

गुलिक के रोग

प्रेतभय, विशभय, षरीरपीड़ा, गन्दगी से उत्पन्न रोग।

6, 8, 12 में जो ग्रह हों, शश्ठेंष सम्बन्धी ग्रहों की बलवता देखकर, बलवान रोग षोक, उस गह की दषान्तर्दषा में कहना चाहिए।

रोग योग

- सूर्य या चन्द्र यदि 2, 12 भावों में मंगल षनि से दृश्ट हों तो नेत्ररोग होता है। द्वितीय भाव दायां नेत्र व द्वादष भाव वाम नेत्र है।
- 3, 11 भावों में गुरू, षनि, मंगल की सिथति हो तो कान में रोग होता है।
- प्ांचम भाव में पापी ग्रह हों तो पेट का रोग होता है। यदि 6, 8 भावेष भी पंचम में हो तो विषेंश उत्कट रोग होता है।
- 7, 8 भावों में पापी ग्रह हो तो गुप्त रोग और उनके साथ षुक्र भी हों तो, भी गुप्तांग रोग विषेश होता है।

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