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फलैट के लिए वास्तुनिर्देष

फलैटस के लिए वास्तुनिर्देष :

1. यदि मुख्यद्वार किसी अषुभ दिषा में खलता हों तो उसे यथासम्भव बन्द रखना चाहिए। इसको केवल जरूरत पड़ने पर ही खोलें। इस द्वार से प्रवेंंष करते समय दिखार्इ देने वाली दीवार पर एक आदमकद दर्पण इस प्रकार लगा देना चाहिए। कि प्रवेंष करने वाला व्यकित को अपना स्ंवय का प्रतिबिम्ब उसमें दिखार्इ ना दें। अनिश्टकारी षकितयां उस दर्पण में अपना स्ंवय का प्रतिबिम्ब देखकर चली जायेंगी। इस दीवार पर विघ्नेष्वर गणपति की तस्वीर अथवा मूर्ति इस प्रकार स्थापित करनी चाहिए कि प्रवेंष करते समय व्यकित की सर्वप्रथम दृशिट इसी पर पड़े।

2. जिन फलैटस के स्नानगृह नैऋत्य और आग्नेय कोंणों में हो, उनको खरीदनें से यथ्सससम्भव बचना चाहिए। चूंकि फलैट के स्नानगृहों को स्थानान्तरित करना सरल कार्य नही होता। परन्तु यदि आप किसी ऐसे फलैट में निवास करते है। तो स्नानगृह में जल का संग्रह न करेंं। नैऋत्य कोण के ठीक विपरीत र्इषान कोण में एक लाल रंग का बल्ब जलाकर रखेंं। स्नान करते समय मुख पूर्व दिषा की ओर रखें।

वास्तुदोश निवारण के मुख्य षोध :

  • दुकान, फैक्ट्री, कार्यालय आदि स्थानोंपर वर्श में एक बार पूजा अवष्य करवानी अनिवार्य है।
  • दुकानों में चोरी होती हो तो दुकान की चौखट में मंगल-यंत्र स्थापित करवाकर पूजा अवष्य करवानी चाहिए।
  • वास्तुदोश से मुकित पाने हेतु वास्तु-पूजन अनिवार्य होता है। इससे वास्तु-दोश लगभग समाप्त हो जाता है।
  • षयनकक्ष में बैठका मदिरा या नषीले पद्वाथों का सेवन नही करना चाहिए। इससे व्यापार, धन, स्वास्थ्य, पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। तथा सदा किसी न किसी की कमी ही रहेगी।
  • अगर कोर्इ व्यकित मानसिक तनाव से ग्रस्त हो रहा हो तो कमरे में षुद्व देषी घी का दीपक प्रज्वलित करके रख देना चाहिए। इसके साथ गुलाब की खुषबू वाली अगरबत्ती भी जलायें। दुकान पर बैठने से मन में उदासी आ रही हो तो मन अनावष्यक रूप से चंचल हो रहा हो तो ष्वेत गणपति की मूर्ति की विधिवत पूजा करके मुख्य प्रवेंषद्वार के आगे ओर पीछे स्थापित करानी चाहिए दुकान का मुख्यद्वार अषुभ हो या वास्तुषास्त्र के अनुसार न बना हो तो ''यमकीलन यंत्र'' का पूजन करके स्थापित करना चाहिए। अगर किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा परेषान किया जा रहा हो तो ''सूर्य यंत्र'' को विधिवत पूजा करके दुकान में स्थापित करें।
  • अपनी रूची के अनुसार सुंगधित फूलों का गुलदस्ता सदैव अपने सिरहाने की ओर (दक्षिण दिषा) के कोने में सजाएं।
  • अज्ञात षत्रु द्वारा दुखी हो तो पंलग के नीचे नया धारदार चाकू अवष्य रखें। परिवार में कोर्इ रोगी हो तो चांदी के पात्र में षुद्व केसरयुक्त गंगाजल भर कर सिरहाने अवष्य रखें।
  • यदि भंयकर कश्ट हो तो तकिये के नीचे पांच हल्दी की गांठें रखकर सोना चाहिए। षत्रु से कश्ट हा रहा हो तो चांदी की महली बनाकर उसे तकिये के नीचे र
  • ख कर सोना चाहिए। गुप्त षत्रु द्वारा कश्ट हो रहा हो तो सात चांदी के सांप बनाकर उनमें सुरमा डालकर पैर क नीचे रखकर सोना चाहिए। प्रिवार में कोर्इ भी तनाव (मानसिक) से गुजर रहा हो तो काले मृग की चर्म बिछाकर सोने से लाभ मिलता है। किसी सदस्य का रात्रि में बुरे स्वप्न सतातें हो तो उस गंगाजल सिरहानें रखकर सोना चाहिए।
  • यदि कश्ट हो रहा हो तो पंलग के नीचे तांबे के बर्तन में पानी रखकर याना चाहिए या तकिये के नीचे लाल चंदन रख कर सोना चाहिए। यदि कश्ट लगातार हो तो सोने-चांदी से मिश्रित नग तकिये के नीचे रखकर सोना चाहिए या कासें के बर्तन में जल भरकर लाल चंदन डालकर पंलग के नीचे रखकर सोना चाहिए।
  • षयनकक्ष में जूठे बर्तन नही रखनें चाहिए इससे रोग उत्पन्न होता है। पतिन के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। धन की कमी अनुभव हाने लगती है।

प्रेतबाधा :

निम्न सिथतियों में जातक की जन्मकुण्डली में प्रेतबाधा होती है।

  • यदि षनि और राहु लग्न में हो तोे जातक को पिषाच बाधा होती है।
  • षनि युक्त चन्द्रमा शश्ठ भाव में हों और सप्तम भाव में राहु और केतु हो तो प्रेतबाधा होती है।
  • यदि राहु युक्त् चन्द्रमा लग्न में हो तो और त्रिकोण में षनि मंगल हो तो पिषाच पीड़ा होती है।

नवग्रह उपासना पद्वति :

प्रत्येक मनुश्य की अवष्य कोर्इ ना कोर्इ राषि अवष्य होता है। और राषि का एक स्वामी ग्रह भी होता है। जब कोर्इ ग्रह खराब बैठ जाता है। तो मनुश्य को विपरीत प्रभाव में डालकर कश्ट, पीड़ा, दु:,ख देता है। जन्म-कुण्डली के अनुसार जब कोर्इ ग्रह खराब स्थान में बैठकर विपरीत प्रभाव से दु:ख होता है। तो कश्ट भोगने के लिए विवष होना पड़ता है। यदि पाठक चाहे तो स्ंवय में सम्बनिधत ग्रह का उपचार ग्रह मंत्र जप कर सकते है। जप करने से ग्रहों के प्रभाव में न्युनता आती है। और वे अनुकूल फल देने लगते हैंं। नीचे सम्बनिधत ग्रहों से सम्बनिधत मंत्र, बीज मंत्र, जप संख्या का विधान स्पश्ट करता हूं-

1. षनि-मंत्र -।। ऊ एं हीं श्रीं षनैष्चराय नम:।।
बीज-मंत्र- ऊ प्रा प्रीं प्रौ स: षनैष्चराय नम:।
जप - 23,000 समय सन्ध्या।

2. मंगल-मंत्र -।। ऊ हूं श्रीं मंगलाएं नम:।।
बीज-मंत्र- ऊ का क्री को भोमाय: नम:।
जप - 1,000 समय दोघड़ी।

3. षुक्र-मंत्र -।। ऊ हीं श्रीं षुक्रायं नम:।।
बीज-मंत्र- ऊ द्रां द्रीं द्रौं स: षुक्रायं नम:।
जप - 6 ,000 समय सूर्योदय।

4. सूर्य-मंत्र -।। ऊ âीं âीं सूर्याय नम:।।
बीज-मंत्र- ऊ हां हीं ही स: सूर्याय नम:।
जप - 23,000 समय सन्ध्या।

5. बुध-मंत्र -।। ऊ ऐं स्त्री श्री बुधाय नम: ।।
बीज-मंत्र- ऊ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
जप - 19,000 समय 5 घड़ी।

6. गुरू-मंत्र -।। ऊ क्लीं बृहस्पते नम: ।।
बीज-मंत्र- ऊ ग्रां ग्री ग्रौ स: गुरवे नम:।
जप - 19,000 समय संध्याकाल।

7. चन्द्रमा-मंत्र -।। ऊ एं क्लीं सोमाय नम: ।।
बीज-मंत्र- ऊ श्री श्री श्री स: चन्द्राय: नम:।
जप - 11,000 समय संध्याकाल।

8. केतू-मंत्र -।। ऊ केतु कृण्वन्नेकेतदे पेषो मयां अपेषसे। समुशटटभर जायथा: केतवे नम: ।।
बीज-मंत्र- ऊ स्वां स्त्री स्त्रौ स: केतवे: नम:।
जप - 19 ,000 समय रात्रि।

9. केतू-मंत्र -।। ऊ कया: नषिचत्र आ भुवदूती सदालवृध: सखी कयाषषिचश्ठता कृता। राहवे नम: ।।
बीज-मंत्र- ऊ भ्रां भ्रीं भ्रौ राहवे: नम:।
जप - 19,000 समय रात्रि।

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