कुंडली के 10 संकेत बताएगे मरने के बाद कैसी होगी आपकी गति

हर कोई इंसान जानना चाहता है कि उसके साथ मरने के बाद में क्या होगा। उसकी गति कैसी होगी या अगले जन्म में वो कहा होगा। लेकिन इस बारे में कोई भी बात कहना मुश्किल है। लेकिन इस बारे में धर्म और ज्योतिष शास्त्र में कुछ इससे जुड़े हुए संकेत बताए गए है।

जानिये धर्म और शास्त्र इस बारे में क्या कहते है?

ऐसी कहावत है कि इंसान जैसा कर्म करता है भगवान उसे वैसा ही फल देता है। कर्मो को हमेशा दो भागो में तोला जाता है अच्छे कर्म और बुरे कर्म लेकिन इन दोनों ही कर्मो के बीच मध्यम कर्म भी होते है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार कर्मो के आधार पर मुख्यत, दो प्रकार की गतियां होती है गति और अगति।गति के दौरान जीव को किसी भी लोक में जाना पड़ता है। गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए है: ब्रह्मलोक, देवलोक, पितृलोक और नर्कलोक।

जो भी जीव होता है वह अपने कर्मो के हिसाब से उक्त लोकों में जाता है। इन लोकों में जाने के लिए तीन मार्ग होते है – अर्चि मार्ग, धूम मार्ग एवं उत्पत्ति और विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग के जरिये ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा की जाती है। धूममार्ग पितृलोक की यात्रा पर ले जाता है वही दूसरी ओर उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।

जो अगति होता है उसमे व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है और उसे वापस जन्म लेना पड़ता है। अगति के चार प्रकार होते है:1.क्षिणोदर्क, 2.भूमोदर्क, 3. अगति और 4.दुर्गति। क्षिणोदर्क अगति के दौरान जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है और संतों सा जीवन जीता है। भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है। अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है। गति में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है।

जानिये ज्योतिष शास्त्र के हिसाब से:

  1. अगर किसी व्यक्ति की कुंडली के लग्न में उच्च राशि का चन्द्रमा हो और कोई पापग्रह उसे देख नहीं रहा हो तो ऐसे व्यक्ति के मरने के बाद में सद्गति प्राप्त करते है।
  2. अगर किसी जातक की कुंडली में कही पर भी कर्क राशि में गुरु स्थित हुआ हो तो जातक मृत्यु के बाद में उत्तम कूल में जन्म लेता है। और इसके अलावा अगर किसी की जन्म कुंडली में चार ग्रह उच्च हो तो वह जातक की श्रेष्ठ मृत्यु का वरण करता है।
  3. किसी भी व्यक्ति की कुंडली के लग्न में उच्च का गुरु चंद्र को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो एवं अष्ठम स्थान ग्रहों से रिक्त हो तो जातक सैकड़ो पुण्य कार्य करते हुए सद्गति प्राप्त होता है।
  4. अगर किसी की कुंडली के लग्न में गुरु और चंद्र चतुर्थ भाव में है और तुला का शनि और सप्तम भाव में मकर राशि का मंगल हो तो जातक जीवन में मृत्यु उपरान्त ब्रह्मलोक नहीं तो देवलोक में जाता है।
  5. अगर किसी व्यक्ति की कुंडली के अष्टम भाव में राहु है तो वह जातक परिस्थिति के कारण पुण्यात्मा बन जाता है। और मृत्यु के बाद में वह इंसान राजकुल में जन्म लेता है।
  6. यदि कोई जातक की कुंडली के अष्टम भाव पर किसी भी प्रकार से शुभ और अशुभ ग्रहों की दृष्टि नहीं पड़ रही हो तो वह भाव ग्रहों से रिक्त हो जाने के बाद जातक ब्रह्मलोक नहीं तो देवलोक की यात्रा करता है।
  7. किसी मनुष्य की कुंडली के अष्टम भाव को गुरु, शुक्र और चंद्र, यह तीनों ग्रह देखते हो या फिर अष्टम भाव को शनि देख रहा हो तथा अष्टम भाव में मकर और कुंभ राशि हो तो जातक मृत्यु के बाद में विष्णुलोक प्राप्त करता है या फिर वैकुण्ड में निवास करता है।
  8. कुंडली के ग्यारहवे भाव में अगर किसी व्यक्ति के सूर्य और बुध हो, एवं नवें भाव में शनि तथा अष्टम भाव में राहु हो तो जातक मृत्यु के पश्चात देवलोक या ब्रह्मलोक को गमन करता है।
  9. कुंडली में अगर बाहरवां भाव शनि, राहु या फिर केतु से युक्त होता है तो अष्टमेश से युक्त हो अथवा षष्ठेश से दृस्ट हो जातक को मरने के बाद में नरक की यात्रा करनी पड़ती है लेकिन अगर उसने पुण्यकर्म किए है तो वह इससे बच जाता है।
  10. अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु लग्न में हो और शुक्र सप्तम भाव में हो तो कन्या राशि का चन्द्रमा हो एवं धनु लग्न में मेष का नवांश हो तो जातक मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है।

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