चमत्कारी मंत्रो से करे अपने जीवन की हर बाधा को दूर

chmatkar-mantra

दुःख जीवन में तन, मन हो या धन किसी भी रूप से मिले, उस दौरान संयम व विवेक का साथ  न छोड़ा जाए तो जीवन में आगे बढ़ने की राह आसान हो जाती है। हिन्दू धर्मग्रंथों के कई सूत्र भी सुख व दुःख में समानता के साथ जीना ही सिखाते हैं। यानी दर्द का अहसास करने पर ही उसका सही उपयोग सफलता व तरक्की के लिए करना संभव हो पाता है।

इसी कड़ी में शक्ति पूजा भी हर दु:ख-दर्द दूर कर सुख, सुकून, राहत और खुशियां देने का उपाय मानी गई हैं। मां दुर्गा के विराट स्वरूप व शक्तियों के स्मरण द्वारा शक्ति साधना के लिए ही देवी सूक्त के चमत्कारी देवी मंत्रों का पाठ साधक की हर मनोरथ को पूरी करने वाला माना गया है।

देवी सूक्त मंत्रों के शुभ प्रभाव से मानसिक कष्ट व कार्य बाधा दूर होती है। यह धन, ऐश्वर्य और वैभव देकर जीवन में आनंद और शांति लाता है। विपरीत हालात में यह हौंसला व मनोबल बनाए रखता है।

शुक्रवार देवी उपासना का विशेष दिन होता है। इस दिन खासकर देवी सूक्त का पाठ घर-परिवार की सुख-समृद्धि के साथ व्यक्तिगत रूप से मन की व्यग्रता को भी दूर करता है। अगली स्लाइड पर जानिए दुर्गा पूजा का सरल उपाय व देवी सूक्त के मंगलकारी मंत्र-

– शुक्रवार के दिन स्नान कर देवालय में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर माता किसी भी स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती या कुलदेवी की ही पूजा की जा सकती है।

– माता को पवित्र जल से स्नान कराएं। उसके बाद गंध, रोली, लाल फूल, अक्षत अर्पित करें।

– माता को मौसमी फल, घी से बने हलवा, चने का भोग लगाएं।

– मां दुर्गा की उपासना के लिए देवी सूक्त का पाठ श्रद्धा व भक्ति से करें।

– अंत में धूप और घी का दीप जलाकर दुर्गा मां की आरती करें और मनोरथ पूर्ति व दु:खों के नाश के लिये प्रार्थना करें।

 

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥1॥

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।

ज्योत्स्ना यै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥2॥

कल्याण्यै प्रणतां वृध्दै सिध्दयै कुर्मो नमो नमः।

नैऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥3॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।

ख्यातै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥4॥

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।

नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥5॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शाध्दिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥6॥

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥7॥

या देवी सर्वभूतेषु बुध्दिरुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥8॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥9॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥10॥

या देवी सर्वभूतेषु छायारुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥11॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥12॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥13॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरुपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥14॥

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