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व्रत-पर्व शंका और समाधान

व्रत-पर्व शंका समाधान
 
धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस तिथि में सूर्य उदय होता है उस तिथि को उदया तिथि कहां जाता है लोगों की धारणा है कि जिस तिथि में सूर्य उदय होता है उसी तिथि में व्रत पर्व उत्सव मनाना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है कि सभी पर्व उत्सव जयंती उदया तिथि में ही मनाई जाए धर्म शास्त्रों के अनुसार कर्म कॉल तिथि मध्य व्यापिनी तिथि प्रदोष व्यापिनी तिथि अर्द्धरात्रि व्यापिनी तिथि निशीथ व्यापिनी तिथि में भी व्रत उत्सव पर्व मनाने का शास्त्रोक्त विधान है।
 
जैसे              
 
1 भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी तिथि को मध्यम दोपहर के समय हुआ था इसमें मध्य व्यापिनी तिथि ही लेना चाहिए उसी तिथि में उत्सव व्रत करना चाहिए।   
 
  2 भगवान परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को प्रदोष काल में हुआ था इसमें प्रदोष व्यापिनी तिथि ही लेना चाहिए जो शाम के समय हो।                            
 
3. भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र बुधवार को अर्ध रात्रि के समय हुआ था परंतु इस व्रत में दो मत है स्मार्त लोग अर्ध रात्रि का स्पर्श होने पर या रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी सहित अष्टमी में भी व्रत उपवास करते हैं परंतु वैष्णव लोग सप्तमी का किंचित मात्र स्पर्श होने पर द्वितीय दिवस में ही वास करते हैं निंबार्क संप्रदाय वैष्णव तो पूर्ण दिन अर्धरात्रि से यदि कुछ पल भी सप्तमी अधिक हो तो भी अष्टमी करके नवमी में ही व्रत करते हैं शेष वैष्णवों में उदय व्यापिनी अष्टमी भी एवं रोहिणी नक्षत्र को ही मान्यता एवं प्रधानता दी जाती है।   
 
 4. श्री गणेश चतुर्थी व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को मध्यम के समय भगवान विघ्न विनायक गणेश जी का जन्म हुआ था इस कारण इस व्रत में मध्य व्यापिनी तिथि ही ली जाती है।
 
5. श्राद्ध कर्म में भी मध्यम व्यापिनी तिथि लेने का विधान है।
                                     
6. नवरात्रा में चैत्र के नवरात्रि में अमावस्या युक्त प्रतिपदा तिथि और शारदीय नवरात्रि में प्रतिपदा युक्त द्वितीया तिथि ग्रहण करना चाहिए।
         
 7.  दशहरा पर्व में प्रदोष व्यापिनी नवमी विधा दशमी तिथि ग्रहण करना चाहिए।
  
 8. शरद पूर्णिमा में निशीथ व्यापिनी तिथि ग्रहण करना चाहिए रात्रि के समय पूर्णिमा रहे।
                                     
9. दीपावली का त्यौहार में निशीथ व्यापिनी अमावस्या ग्रहण करना चाहिए जो रात्रि के समय हो क्योंकि दीपावली का त्यौहार रात्रि में ही मनाया जाता है प्रदोष काल से रात्रि में अमावस्या रहे।
            
10. महाशिवरात्रि का पर्व जिस दिन रात्रि के समय चतुर्दशी तिथि रहे उसी दिन मनाना चाहिए इसमें अर्धरात्रि व्यापिनी चतुर्दशी ग्रहण करना चाहिए महर्षि वेदव्यास जी ने पुराणों में व्रत पर्व एवं उत्सव संबंधी संपूर्ण मार्गदर्शन किया है व्रत पर्व और उत्सव हमारी लौकिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के सशक्त साधन है मेरा अपना यह मानना है कि हर व्रत पर्व उत्सव में उदया तिथि का महत्व नहीं है कुछ त्योहार व्रत उत्सव पर्व उदया तिथि से मनाए जाते हैं कुछ कर्म कॉल विद्वान लोग जब कोई संकल्प करते हैं तो जिसमें सूर्य उदय हुआ है उस तिथि के साथ कर्म कॉल तिथि का भी उच्चारण करते हैं।

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