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कार्तिक मास (राधा-दामोदर मास)विशेष

भगवान विष्णु और राधारानी को भी यह महीना सबसे अधिक पसंद है। भगवान विष्णु ने इसमें मत्स्य अवतार लिया था और राधारानी को यह महीना इसलिए पसंद है, क्योंकि इसमें भगवान कृष्ण ने विलक्षण लीलाएं की हैं।
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जिस प्रकार श्रावण मास शिव को समर्पित है, तो फाल्गुन कामदेव को, उसी तरह पुरुषोत्तम मास विष्णु को.. तो कार्तिक मास श्रीकृष्ण को। इसीलिए, कार्तिक के संदर्भ में, ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण को वनस्पतियों में तुलसी, पुण्यक्षेत्रों में द्वारिका, तिथियों में एकादशी, प्रियजनों में राधा, महीनों में कार्तिक विशेष प्रिय हैं। इसीलिए कहते है
कृष्ण प्रियो हि कार्तिक.. कार्तिक: कृष्ण वल्लभ:|
कृष्ण को कार्तिक क्यों प्रिय है, इसके लिए भविष्य पुराण में एक कथा है। कृष्ण की प्रतीक्षा में राधा कुंज में बैठी थी, कृष्ण की प्रतीक्षा में समय बीत रहा था और राधा की व्यग्रता भी। काफी प्रतीक्षा के पश्चात कृष्ण आए, तब राधा खीझ उठी और उन्होंने अपना गुस्सा उतारने के लिए कृष्ण को लता-ओं की रस्सी से बांध दिया.. पर कृष्ण मंद-मंद मुस्कराते रहे।
 
यह देख राधा शीघ्र ही सामान्य संयत हो गई और कृष्ण से विलम्ब का कारण पूछा। कृष्ण ने बतलाया कि उस दिन 'कार्तिक' में मनाया जाने वाला एक पर्व था और मैया यशोदा ने उन्हें रोक लिया और आयोजन के बाद ही उन्हें आने दिया। कारण जानकर राधा को क्षोभ हुआ और वह कृष्ण से क्षमा मांगने लगी। इस पर कृष्ण ने कहा कि राधा क्षमा मत मांगो, मैं तो तुम्हारे साथ बंधा ही हूं और चूंकि आज तुमने प्रत्यक्ष रूप से मुझे बांधा। इसलिए यह महीना मुझे विशेष रूप से प्रिय होगा। इस तरह कार्तिक महीने को एक और नाम मिला ‘राधा-दामोदर मास’। इस संबंध में ऐसी मान्यता है कि इस महीने में राधा रानी का विधिपूर्वक पूजन-अर्चन करने से श्रीकृष्ण अत्यंत ही प्रसन्न होते हैं और वे सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं, क्योंकि राधा को प्रसन्न करने के समस्त उपक्रम कृष्ण को अतिप्रिय होते हैं।
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कार्तिक मास मे ही माँ यशोदा ने एक रस्सी (दाम) लेकर बाल कृष्ण के पेट (उदर) को ऊखल से बाँध दिया था। जिस कारण “दामोदर मास” नाम पड़ा।
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पद्मपुराण के अनुसार कार्तिक के समान पुण्य प्रदायक श्रेष्ठ कोई ओर महीना नहीं है। इस महीने में जो श्रद्धालु भगवान विष्णु के सम्मुख रात्रि जागरण करते हैं, प्रात: वारुण स्नान (किसी तड़ाग, जलाशय, नदी में स्नान), तुलसी की सेवा, उद्यापन और दीपदान करते हैं, उन्हें भगवान का सान्निध्य तथा अति पुण्य प्राप्त होता है।
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तुलसी महारानी के लिए भी यह महीना बेहद महत्व रखता है। तुलसी महारानी का प्राकट्य धराधाम पर 'कार्तिक' में ही हुआ था।
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भारत के सभी तीर्थों के समान पुण्य फलों की प्राप्ति एक इस माह में मिलती है। इस माह में की पूजा तथा व्रत से ही तीर्थयात्रा के बराबर शुभ फलों की प्राप्ति हो जाती है। इस माह के महत्व के बारे में स्कन्द पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण आदि प्राचीन ग्रंथों में मिलता है..!!

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