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मोक्षप्रदायक है कार्तिक मास, ये चमत्कारी उपाय जगाएंगे आपका भाग्य-

ज्योतिषीय एवं धर्मशास्त्रीय दृष्टि से कार्तिक मास में किया स्नान, व्रत व दान काफी पुण्यकारी माने जाते हैं। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में लिखा है कि वर्षभर में किए पुण्य कर्मों की अपेक्षा महिलाओं के लिए कार्तिक स्नान व्रत व दान करने से दस गुणा ज्यादा लाभ होता है। भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए भी इस मास में पूजा व व्रत रखना चाहिए। स्कंद व मत्स्य पुराण के अनुसार कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं, युवतियों को मास पर्यंत क्रोध न करना, ईष्र्या, द्वेष नहीं रखना चाहिए। वन्य जीवों, पालतु पशुओं, तथा पक्षियों के लिए किसी भी प्रकार की हिंसा न करे। चोरी, व्यभिचार व किसी भी प्राणी को कायिक, वाचिक और मानसिक रूप से आघात नहीं पहुंचाना चाहिए।
 
प्रसन्न हृदय से करें आराधना-
 
कार्तिक स्नान कर रहीं महिलाओं को प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल लेकर डाब से गाय के दाहिनें सींग को सींचना चाहिए। गाय को अनाज व हरी घास खिलाना इस मास में पुण्यकारी माना गया है। कार्तिक मास में गोवत्स द्वादशी या पूरे माह में योग्य ब्राह्मण को गोदान करने से उसे नरक का मुंह नहीं देखना पड़ता तथा नारकीय यातनाएं नहीं सहनी पड़ती है, ऐसा विष्णु पुराण में उल्लेख मिलता है। पूरे कार्तिक मास तक तुलसी की पूजा करनी चाहिए तथा विष्णु व लक्ष्मी के श्लोक पढऩे चाहिए। आंवले व केले के पेड़ को पूरे कार्तिक माह तक सींचना चाहिए और उनके प्रतिदिन सात-सात परिक्रमाएं भी करनी चाहिए। परिक्रमा के दौरान ऊं विष्णवे नम: का उच्चारण करना लाभकारी माना गया है।
 
मंत्र और जप से श्रीहरी और मां लक्ष्मी को रिझाएं -
 
कार्तिक मास में लक्ष्मी प्राप्ति व परिवार में अलगाव को समाप्त कर मधुर संबंधों की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन तुलसी के पौधे के नीचे 21 बार इस मंत्र का पीले वस्त्र धारण कर जाप करना चाहिए-
 
न वनिता न सुतो न सहोदरो
न हि पिता जननी न च बांधव:।
 
वृजति साकमनेन जनेन वै भजत रे मनुजा: कमलापतिम्।।
 
 ऊं विष्णवे नम:
 
महिलाओं के अखंड सौभाग्य एवं परिवार की सलामती के लिए किसी नदी, तीर्थस्थल, मंदिर या अपने पूजा घर में 51 बार मां गंगा के इस मंत्र का प्रतिदिन कार्तिक मास में जाप करें-
 
रोगं शोकं तापं पापं हर में भगवति कुमतिकलापम्।
 
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गति: मम खलु संसारे।।
ऊं गंगायै नम:
 
मानसिक रोगियों व घर में बढ़ रही अशांति,तांत्रिक पीड़ा एवं दु:ख बाधा निवारण के लिए तुलसी के पौधे के पास बैठकर या विष्णु मंदिर या अपने पूजा कक्ष में प्रतिदिन 111 बार इस  श्लोक का जाप करना चाहिए-
 
लभेयं तां शांतिं परममुनिभिर्या ह्यधिगता।
 
दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशांतिं भवहर।। 
 
ऊं नारायणाय नम:
 
अपनी सुविधा के अनुसार महिलाओं को कार्तिक मास में किए स्नान व व्रत आदि के बाद कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को 7 या 21 ब्राह्मण जोड़ों को भोजन कराना चाहिए तथा भगवान विष्णु के लिए हवन करवाना भी उत्तम रहता है। कार्तिक मास में ही तांबे, वस्त्र, गाय, चांदी का दान करना उत्तम है। शुक्रवार या रविवार को सुहागिनों को कम्बल या आभूषण का दान या सुहागिनी संबंधी दान करने से दंपत्ती दीर्घायु होती हैं, ऐसा मार्कण्डेय पुराण का अभिमत है।
 
व्रतोपवास और आहार-
 
ब्रह्मपुराण के अनुसार रोगी या शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति दो समय भोजन कर सकते हैं। भूलकर भी कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं को इस मास में आंसू नहीं बहाना चाहिए। कलह नहीं करना चाहिए। पूरे मास स्नान करने से सूर्योदय के सवा दो घंटे बाद तक पीले वस्त्र या पीली ओढऩी का प्रयोग कर सकते हैं। ऐसा पद्म व कूर्म पुराण का मत है। व्रतोपवास के दौरान विवाहिताओं के लिए मंगल सिंदूर लगाना चाहिए। इस माह ज्यादा सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के उपयोग से भी बचना चाहिए। साथ ही तिल का तेल, श्रीखंड व आंवले का भी सेवन करना चाहिए। पवित्र कार्तिक मास तन और मन दोनों को शुद्ध करने का माध्यम है।
 
क्षमाशीलता व दान का मास -
 
कार्तिक स्नान व व्रत करने से मृत्यु मुख में जा रहा व्यक्ति भी बच निकलता है, ऐसा ब्रह्म पुराण और भविष्य पुराण में लिखा गया है। वास्तव में इस मास के धार्मिक कृत्यों के लिए जो लोग क्षमाशील, विनम्र, दयाभाव, दानी, जितेन्द्रिय, आस्तिक, संतोषी, पाखंड से दूर रहने वाले, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य व सात्विक भोजन करने वाले कार्तिक स्नान व व्रत के अधिकारी होते हैं। इतना ही नहीं कार्तिक स्नान व व्रत करने वालों को नमक व शहद का बहुत कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। यथा संभव जौ के आटे का सेवन करें व एक समय भोजन करें। भोजन में तुलसी पत्ते का सेवन जरूर करना चाहिए।

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