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पितृ पक्ष में किस तरह करें तरपण, जानें किस दिन किसका होना चाहिए श्राद्ध-

पितृ पक्ष महालया 25 सितम्बर से आरम्भ हो रहा है।मध्यान्ह में प्रतिपदा न मिलने से प्रतिपदा का श्राद्ध 25सितम्बर को किया जायेगा।
 
शास्त्रों में मनुष्य के तीन ऋण कहे गये हैं देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण। इसमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है। ब्रह्म पुराण के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज यमपुरी से पितृों को मुक्त कर देते हैं और वे अपनी संतानों तथा वंशजों से पिण्ड दान लेने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। सूर्य के कन्या राशि में आने के कारण ही आश्विन मास के कृष्ण पक्ष का नाम 'कनागत' पड़ गया। क्योंकि सूर्य के कन्या राशि में आने पर पितृ पृथ्वी पर आकर अमावस्या पर घर के द्वार पर ठहरते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से प्रारम्भ करके आश्विनी कृष्ण अमावस्या तक 16 दिन पितृों का तर्पण और विशेष तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए, इस प्रकार करने से यथोचित रूप से पितृ व्रत पूर्ण होता है।
 
 
शास्त्रों में 12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन है...
 
1. नित्य श्राद्ध 
2. नैमित्तिक श्राद्ध 
3. काम्य श्राद्ध
 4. वृद्धि-श्राद्ध 
5. सपिण्डन श्राद्ध 
6. पार्वण श्राद्ध 
7. गोष्ठ श्राद्ध 
8. शुद्धि श्राद्ध 
9. कर्मांग श्राद्ध 
10. दैविक श्राद्ध 
11. औपचारिक श्राद्ध 
12. सांवत्सरिक श्राद्ध
 
सभी श्राद्धों में सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ है। इसे मृत व्यक्ति की तिथि पर करना चाहिए। श्राद्ध में सात महत्वपूर्ण चीजें हैं- दूध, गंगाजल, मधु, तसर का कपड़ा, दौहित्र, कुतप (दिन का आंठवा मुहुर्त) और तिल। 
 
श्राद्ध में लोहे के पात्र का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए, सोने, चांदी, कांस्य और तांबे के पात्र पूर्ण रूप से उत्तम हैं। केले के पत्ते में श्राद्ध, भोजन सर्वथा निषेद्ध है। मुख्य रूप से श्राद्ध में चांदी को विशेष महत्व दिया जाता है। 
 
कैसे करें श्राद्ध-
 
श्राद्धपक्ष में श्राद्ध वाले दिन प्रातःकाल घर को स्वच्छ कर पुरूषों को सफेद वस्त्र एवं स्त्रियों को पीले अथवा लाल वस्त्र धारण करना चाहिए। श्राद्ध का उपयुक्त समय कुतुपकाल मध्यान्ह होता है। भोज्य सामग्री बनने के पश्चात् सर्वप्रथम हाथ में कुश, काले तिल और जल लेकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके संकल्प लेना चाहिए, जिसमें अपने पितृों को श्राद्ध ग्राह्म करने के लिए इनका आवाहन करने और श्राद्ध से संतुष्ट होकर कल्याण की कामना करनी चाहिए। तत्पश्चात् जल, तिल और कुश को किसी पात्र में छोड़ दें एवं श्राद्ध के निमित्त तैयार भोजन साम्रगी में से पंचवली निकालें। देवता के लिए किसी कण्डे अथवा कोयले को प्रज्ज्वलित कर उसमें घी डालकर थोड़ी-थोड़ी भोज्य सामग्री अर्पित करनी चाहिए। शेष बलि जिनके निमित्त है उन्हें अर्पित कर देनी चाहिए। श्राद्ध के लिए पंचबली विधान के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। तदोपरान्त ब्राह्मणों को अपना पितृ मानते हुये ताम्बूल और दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए और उनकी चार परिक्रमायें करनी चाहिए, साथ ही श्रद्धा के अनुसार उन्हें दान करना चाहिए। श्राद्ध काल में इन मंत्रों का जाप करना पितृ दोष से शांति करवाता है। 
 
इन्हें श्राद्ध काल में प्रतिदिन 108 बार जप करना चाहिए
  
किस तिथि पर किसका श्राद्ध करें 
 
आश्विनी कृष्ण प्रतिपदा - यह तिथि नाना-नानी के श्राद्ध के लिए उत्तम मानी गई है।
 
आश्विनी कृष्ण पंचमी - इस तिथि में  परिवार के उन पितृों का श्राद्ध करना चाहिए, जिनकी अविवाहित अवस्था में ही मृत्यु हुई हो। 
 
आश्विनी कृष्ण नवमी - यह तिथि माता एवं परिवार की अन्य महिलाओं के श्राद्ध के लिए उत्तम मानी गई है।
 
एकादशी व द्वादशी - आश्विनी कृष्ण एकादशी व द्वादशी को उन पितृों का श्राद्ध किया जाता है, जिन्होंने सन्यास ले लिया हो। 
 
आश्विनी कृष्ण चतुर्दशी - इस तिथि को उन पितृों को श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो। 
 
आश्विनी कृष्ण अमावस्या - इस तिथि को सर्व पितृ अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन सभी पितृों को श्राद्ध किया जाना चाहिए।

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