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जन्माष्टमी पर पंजीरी बनाये जाने के पीछे भी है वैज्ञानिक कारण

मित्रों नमस्कार!सर्वप्रथम आप सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें मैने हमेशा कोशिश की है कि हर भारतीय त्योहार व उससे जुडे खान-पान का वैग्यानिक विश्लेशण किया जाएl जन्माष्टमी के इस पावन पर्व पर अपने पिछले लेख में मैने बताया था कि किस प्रकार सजग रहकर हम मिलावटी कुट्टू आदि से दूर रह सकते हैं l
आज इस लेख के द्वारा मैं जन्माष्टमी पर पंजीरी बनने के विधान पर प्रकाश डालना चाहूँगा
 
- वर्षा काल में वात प्रकोप होता है व विभिन्न वात विकार उत्पन्न होते हैं। वर्षा काल में मनाये जाने वाले उत्सव से मन उल्लासित रहता है, चिन्ता, शोक भय से वायु की वृद्धि होती है एवं हर्ष, उल्लास, प्रसन्नता, उत्साह से वायु का नाश होता है अत: ऐसे त्यौहार मनाने से शारीरिक एवं मानसिक प्रसन्नता प्राप्त होती है।
 
- जन्माष्टमी पर बनायी जाने वाली पंचजीरी जिसका अपभ्रंश पंजीरी हो गया, वात का शमन करने वाली है इसमें धनियाँ, अजवाइन सौंफ, जीरा एवं सोया बराबर मात्रा में लिया जाता है इनको पीसकर चूर्ण बना इसमें बूरा व शुद्ध घी मिलाते हैं, जो वात का शमन एवं अनुमोलन करने वाला होता हैइसी के साथ पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) अत्यन्त पौष्टिक एवं वातशामक होता है।*
 
-इस अवसर पर पायी जाने वाली नीम एवं पंच-पल्लव(आम,कैथ,बेल,जामुन
बिजोरा के पत्ते)की बाँदनवार भी जीवाणु नाशक होती है। यें पाँचो प्रकार के पेड इस समय फल रहित होकर विसर्ग काल होने के कारण नई ऊर्जा प्राप्त करते हैं और बदले में उसे हमारे वातावरण में प्रतिपादित करते हैं जन्माष्टमी के बाद 10 दिन तक पंचजीरी चूर्ण 20 ग्राम की मात्रा में तथा पंचामृत का सेवन करने का विधान था जिसका स्वरूप स्वादिष्ट-गरिश्ठ लड्डू-पेडो ने ले लियाl इस आधुनिक युग में पूरे वर्ष मिश्ठान-पकवान मे रहते हुए भी क्या हमे उपवास वाले त्योहार उसके सच्चे स्वरूप में नही मनाने चाहियें
 
- लेकिन धीरे-धीरे हर प्रचलन,हर कारण का स्वरूप बदल जाता है और वह अपनी सुविधा,अपने स्वादानुसार विकृत कर दिया जाता हैl

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