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क्या है ज्योतिष और उसका प्रभाव ?

ज्योतिष विद्यादायिनी माता सरस्वती का एक ऐसा वरदान है, जिसका सम्पूर्ण वर्णन करना किसी मानव ज्योतिषी के लिए गागर में सागर भरने के समान है।

ज्योतिष शब्द की व्युत्पति ज्योति से हुई है। ज्योति का अर्थ है ,प्रकाश। जिन शब्दों से प्रकाश की किरणें निकलती है, उन्हें ज्योतिष्क कहा जाता है। आकाश-मंडल में, दिन के समय में सूर्य तथा रात्रि के समय तारों के रूप मे असंख्य ज्योतिष्क चमकते हुए दिखाई देते है, जिनका प्रभाव पृथ्वी पर स्थित समस्त चर और अचर पर पड़ता है।

इनकी स्थिति तथा प्रभाव आदि के विषय में ज्ञान प्राप्त करने की विद्या को ज्योतिष कहते हैं। जिस ग्रन्थ में इस विद्या का संग्रह और संकलन हो, उसे ज्योतिष-शास्त्र कहते हैं ,और ज्योतिष-शास्त्र के ज्ञाता को ज्योतिषी कहते हैं।

ज्योतिष एक महत्वपूर्ण बहु-उपयोगी विषय है। इससे सूर्य आदि ग्रहों,समस्त-नक्षत्रों तथा धूमकेतुओं का ज्ञान और समस्त पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी मिलती है। जिस पृथ्वी पर हम निवास करते हैं, उसके चारों ओर जो भी दृष्टिगोचर होता है ,तथा जिसके विषय में हमें जो भी ज्ञान है, उसे विश्व कहते हैं।

विश्व में न केवल सम्पूर्ण पृथ्वी तथा समुद्र की गणना की जाती है ! बल्कि आकाश का वह भाग भी आता है, जिसमे स्थित सूर्य, चंद्रमा आदि ग्रहों सहित सम्पूर्ण नक्षत्र भी हैं, जो हमें दिखाई देते हैं। ये सभी विषय-वस्तु ज्योतिष-शास्त्र के विचारणीय प्रसंग हैं।

सृष्टि के आरम्भ में जब मानव, संसार में आया तब अपने नए-नए अनुभवों को लेकर कई कार्य क्षेत्रों में प्रवेश किया और अपने कठिनाईयों का समाधान तथा अपने जिज्ञासाओं की पूर्ति विभिन्न रीतियों से करता था। उन्हीं समस्याओं की समाधान के विधान के रूप में ज्योतिष का आगमन हुआ।

इसमे स्वप्न द्वारा शुभ-अशुभ फलों का ज्ञान, स्वर के द्वारा शुभ-अशुभ का ज्ञान, अंग का फड़कना, वृष्टि ज्ञान, उत्पात-दर्शन, सामुद्रिक विद्या द्वारा शुभ-अशुभ का ज्ञान आदि का विस्तृत विवेचन मिलता है।

वेद संसार की सर्वाधिक प्राचीन पुस्तक है। इसे सब विद्याओं का मूल माना जाता है। वेद के ६ अंग माने गए है, जिसमे ज्योतिष को नेत्र माना गया है। अन्य अंगों में शिक्षा नासिका है, व्याकरण मुख है, निरुक्त कान है, कल्प हाथ है और छंद चरण है। जिस प्रकार नेत्रों द्वारा विभिन्न वस्तुओं की गतिविधियों को देखा जाता है, उसी प्रकार ज्योतिष-शास्त्र के द्वारा भूत, भविष्य और वर्त्तमान-काल में घटने वाली घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जाती है, इसीलिए इसे वेद में नेत्र कहा गया है।

यह विद्या भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की कृति वेदांगज्योतिष से इसकी प्राचीनता का पर्याप्त परिचय मिलता है। वैदिक कालीन महर्षियों को तारामंडल की गतिविधियों का पूर्ण ज्ञान था, इसमे संदेह नहीं है। ज्योतिष-शास्त्र वेदांग होने के कारण वेद के समान ही इसकी भी प्राचीनता प्रमाणित होती है।

प्राचीन विद्वानों ने ज्योतिष को दो भागों बांटा है :-

१. सिद्धान्त ज्योतिष और
२. फलित ज्योतिष


१. सिद्धान्त ज्योतिष:-

ज्योतिष विद्या के जिस भाग द्वारा समस्त ग्रहों और नक्षत्रों आदि की गति ,अवस्था,प्रकृति आदि का निर्धारण किया जाता है उसे सिद्धान्त-ज्योतिष यानि गणित ज्योतिष कहा जाता है।

२. फलित ज्योतिष :-

ज्योतिष विद्या के जिस भाग के द्वारा समस्त ग्रहों और नक्षत्रों आदि की गति को देखकर प्राणियों की अवस्था और समस्त प्राणियों पर पड़ने इस शुभ-अशुभ प्रभाव का निर्णय किया जाता है, उसे फलित ज्योतिष कहते हैं।

ज्योतिष शास्त्र विज्ञान सम्मत होने के साथ-साथ भारतीय धर्म-दर्शन से भी जुड़ा है ,और इसके बिना धर्म आदि कार्यों का संपादन असंभव है।

भारत के सभी पर्व त्यौहार जैसे :- होली, नवरात्र, दशहरा,दीवाली, रक्षाबंधन, गणेश-चतुर्थी,भैया-दूज, छठ, पूर्णिमा, मकर-संक्रांति आदि समस्त पर्वों का निर्धारण ज्योतिष शास्त्र से ही किया जाता रहा है।

अगर ज्योतिष-शास्त्रों को नहीं माना जाय तो भारत के ये सभी पर्व त्योहारों का निधारण नहीं हो पायेगा और भारतीय संस्कृति पर्व त्यौहार विहीन हो जायेगी, जो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की मूल पहचान और शान है।

सूर्य-सिद्धान्त जो एक प्रमुख आर्ष-ग्रन्थ है, इसमे सिद्धान्त ज्योतिष की प्रायः सभी बातें पायी गयी है।

तैत्तिरीय-ब्राह्मण में सूर्य, पृथ्वी, दिन और रात्रि आदि की जो बातें मिलती है, उससे ज्ञात होता है की प्राचीन काल में भी भारत वासी ग्रहों और ताराओं के भेद को भली-भांति जानते थे। महाभारत में भी समस्त नक्षत्रों की सूची दी गयी है ,और बतलाया गया है कि भिन्न-भिन्न नक्षत्र पर दान देने से भिन्न-भिन्न प्रकार का पुण्य होता है। भीष्म ने भी अपनी प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण की चर्चा की है।

वहीँ जब श्री कृष्ण ने कर्ण से भेंट की, तब कर्ण ने ग्रह स्थिति का इस प्रकार वर्णन किया है :-

उग्र शनैश्चर रोहिणी नक्षत्र में बैठकर मंगल को पीड़ा दे रहा है, ज्येष्ठा नक्षत्र से मंगल वक्री होकर अनुराधा नक्षत्र से मिलना चाहता है, महापात संज्ञक ग्रह चित्रा नक्षत्र को पीड़ा दे रहा है, चंद्र के चिन्ह बदल गए है और राहु सूर्य को ग्रसना चाहते हैं।

भीष्म-पर्व में पुनः हम अनिष्टकारी ग्रह्-स्थिति देखते है कि १३ दिनों का पक्ष इसी समय आया है। इससे भी अधिक विकट बात यह है कि एक हीं मास में चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण का योग है।

महाभारत के इन प्रसंगो से यह ज्ञात होता है कि नाना-प्रकार के ग्रहों का योग भीषण संकटों का संकेत दे रहा है।

अतः इससे यह स्पष्ट है कि व्यक्ति के सुख-दुःख, जन्म-मरण, उन्नति-संकट आदि ग्रहों और नक्षत्रों की गति से सम्बंधित है।

चन्द्रमा के प्रभाव से ही समुद्र में ज्वार-भाटा का प्रभाव होता है। जिस प्रकार चन्द्रमा ज्वार-भाटा में समुद्र के जल में उथल-पुथल देता है, उसी प्रकार वह शरीर के रुधिर प्रभाव में भी अपना प्रभाव डालकर दुर्बल मनुष्य को रोगी बनाता है। ग्रहों का प्रभाव मानव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वनस्पतियों पर भी पड़ता है ! जैसे :- पुष्प प्रातःकाल में खिलते हैं और सायं काल में सिमट जाते हैं ! ऐसे-ऐसे कई उदहारण हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अठारह मुख्य प्रवर्तक माने जाते हैं :-

१. सूर्य २. ब्रह्मा ३. व्यास ४. वशिष्ठ ५. अत्रि ६. पराशर ७. कश्यप ८. नारद ९. गर्ग १०. मरीचि ११. मनु १२. अंगिरस १३. लोमश १४. पौलिश १५. च्यवन १६. यवन १७. भृगु और १८. शौनक।

ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ज्योतिष विद्या महान एवं अद्वितीय है ,और इसका प्रभाव विश्व के सभी जीव-जंतु से लेकर वनस्पति-जगत और समुद्र तक पर निश्चित रूप से पड़ता है।

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