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*भगवान! प्रार्थना क्या है?

प्रार्थना प्रेम का निचोड़ है। जैसे फूलों को निचोड़ो, इत्र बने--ऐसे प्रेम के सारे रूपों को निचोड़ो तो प्रार्थना बने। जैसे फूलों में सुगंध है, ऐसे प्रेम की सुगंध प्रार्थना है। प्रार्थना न तो हिंदू होती, न मुसलमान, न ईसाई। और अगर हो तो समझना कि प्रार्थना नहीं है, कुछ और है; धोखाधड़ी है,आत्मवंचना है। और धोखाधड़ी परमात्मा तक नहीं पहुंचती। असली सीढ़ियां चाहिए, तो ही उस मंदिर के द्वार तक पहुंच पाओगे।

प्रार्थना न तो हिंदू होती, न मुसलमान, न ईसाई--प्रार्थना होती है हार्दिक। और हृदय का कोई संबंध संप्रदायों से नहीं है, न शास्त्रों से है। हृदय का संबंध तो उत्सव से है, आनंद से है, संगीत से है, नृत्य से है। हृदय के नृत्य, हृदय के संगीत,हृदय के उत्सव का नाम प्रार्थना है।

यदि तुम उत्सव भरी आंखों से जगत को देखने लगो तो तुम्हारे चौबीस घंटे का जीवन ही प्रार्थना में रूपांतरित हो जाएगा। जिन आंखों में उत्सव की तरंग है, उन्हें पक्षियों की आवाज में प्रार्थना सुनाई पड़ेगी। कुरान की आयतें फीकी पड़ जाएंगी; गीता के श्लोक--दूर की प्रतिध्वनियां; वेद की ऋचाएं--अर्थहीन। उन्हें सुबह के ऊगते सूरज में प्रार्थना का आविर्भाव दिखाई देगा।

जिसे सुबह के ऊगते सूरज में प्रार्थना न दिखी, उसे परमात्मा कभी भी दिखाई नहीं पड़ सकता। प्राची पर फैल गई लाली, सुबह की ताजी हवाएं, पक्षियों के गीत, उड़ान, फूलों का अचानक खिल जाना--और तुम्हें प्रार्थना नहीं दिखाई पड़ती? पक्षियों को भी पता चल जाता है कि आ गई घड़ी उत्सव की। फूलों को भी पता चल जाता है कि खुलो अब, कि लुटा दो अपनी सुवास को! लेकिन तुम्हें पता नहीं चलता।

आदमी का मन जैसे पत्थर हो गया है! और पत्थर हो जाने के पीछे कारण यही बातें हैं। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई जैन है, कोई ईसाई है--आदमी कोई भी नहीं।

आदमी कहां खो गया है? किस जंगल में खो गया है?शास्त्रों के, शब्दों के! और प्रार्थना का न शास्त्रों से कोई संबंध है, न शब्दों से कोई संबंध है। यह तो निःशब्द हृदय की पुकार है।

और प्रार्थना सदा निजी होती है, सामूहिक नहीं होती। क्योंकि हृदय निजी बात है। दो व्यक्तियों की प्रार्थना एक जैसी नहीं हो सकती। और तुम जब प्रार्थना सीख लेते हो तो औपचारिक हो जाती है।


प्रेम-पत्र भी उधार हैं, वे भी किसी और से लिखवाए गए हैं! तो तुम्हें हंसी आती है। लेकिन तुम्हारी प्रार्थना? वह भी तो प्रेम-पत्र है परमात्मा के नाम, प्रेम की पाती है। वह भी तो उधार है। वह भी तुमने पंडितों से सीख ली है। वह भी तुम्हारी अपनी नहीं है।

अगर तुम्हारे हृदय से उठे, फिर चाहे तुम्हारे शब्द तुतलाते हुए ही क्यों न हों, पहुंच जाएंगे। लेकिन पुकार अपनी हो, बासी न हो, उधार न हो। सीधी-सादी हो, औपचारिक होने की जरूरत नहीं। बहुत अलंकृत नहीं चाहिए। कोई परमात्मा सिर्फ संस्कृत ही समझता है, इस भ्रांति में मत रहना--कि तुम जब संस्कृत में प्रार्थना करोगे, तब समझेगा। तुम ही न समझोगे तो परमात्मा क्या खाक समझेगा! पहली समझ तो तुम्हारी तरफ घटनी चाहिए। और तुमने अगर समझी तो तुम्हारे समझने में ही परमात्मा ने समझ ली। और तुम्हारा हृदय अगर ओत-प्रोत हो गया, रसमग्न हो गया, तुम अगर डोल उठे, तुम अगर नाच उठे, अनायास तुम्हारे पैरों में घूंघर बंध गए और तुम्हारे कंठ से स्वर फूटे--फिर चाहे वे बहुत काव्यपूर्ण न हों,जरूरत भी नहीं है--जरूर पहुंच जाएंगे!

हार्दिक जो भी है वह सत्य है। बौद्धिक जो भी है वह असत्य है।

पूछते हो, अविनाश: "प्रार्थना क्या है?'

हृदय की पुकार! करुण-पुकार! क्योंकि मनुष्य अकेला है। और मनुष्य के पास बड़े छोटे हाथ हैं और सागर का विस्तार बहुत, कैसे तैर पाएंगे! इसलिए मनुष्य अभीप्सा करता है अस्तित्व से कि मुझे साथ दो! हे पक्षियो, मुझे पंख दो! हे सूरज, मुझे रोशनी दे! हे चांदत्तारो, मेरे रास्ते को दीयों से भर देना! प्रार्थना और क्या है? अस्तित्व से मांग है इस बात की कि मैं अकेला हूं, बहुत छोटा हूं--और जीवन बड़ा है, विराट है। मेरे पैर बहुत छोटे, सामर्थ्य बहुत सीमित--और चढ़ने हैं उत्तुंग पर्वत। हे हवाओ, मुझे ले चलो! हे बादलो, मुझे उठा लो! एक करुण पुकार है। जैसे छोटा बच्चा रोए अपनी मां के लिए, बस ऐसे ही। प्रार्थना आंसुओं से बनती है, शब्दों से नहीं; असहाय अवस्था में निर्मित होती है, पांडित्य में नहीं।

प्रार्थना विस्मय-विमुग्ध भाव है। यह जगत कितने आश्चर्य से भरा हुआ है! इस जगत में प्रतिपल चमत्कार घट रहे हैं--विस्मय पर विस्मय! बीज फूटता है, अंकुरित होता है, और तुम चमत्कृत नहीं होते? बीज, जो अभी कंकड़ की तरह था,उसमें से हरे पत्ते निकल आए हैं! बीज, जो अभी ना-कुछ था,काटते तो न हरे पत्ते मिलते, न लाल सुर्ख फूल मिलते। वर्षा का झोंका आया है, बीज अंकुरित हो उठा है, हरे पत्ते निकल आए हैं, लाल सुर्ख फूल जगने लगे हैं--और तुम चमत्कृत नहीं होते? इतना विराट अस्तित्व और इतनी नियमबद्धता से चल रहा है! इतने अनंत तारे और टकरा नहीं जाते!

तुम अगर जरा आंख खोल कर देखो तो आश्चर्य में डूब जाओगे। वही आश्चर्य प्रार्थना की जननी है। तुम अगर आंख खोल कर देखो तो कृतज्ञता में झुक जाओगे। कितना दिया है! तुम्हारी पात्रता क्या है? आंखें दी हैं कि देख सको चांदत्तारों को, कान दिए हैं कि सुन सको अमृत संगीत को,हाथ दिए हैं कि स्पर्श कर सको अस्तित्व को, हृदय दिया है कि अनुभव कर सको उस सबका जो पकड़ में भी नहीं आता,बुद्धि की समझ में भी नहीं आता। इतना सब दिया है किसी अज्ञात स्रोत ने, तुम धन्यवाद नहीं दोगे? वही धन्यवाद प्रार्थना है।



            🌹❤ Osho ❤🌹

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