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जल वास्तु का उपयोग करे-सुखी समृद्ध जीवन के लिए

 
जल ही जीवन है जल के बगैर सब शून्य है। भवन व जीवन वहीं निवास करता 
 
है जहां जल होता हैं। जहां जल होता हैं वहीं हरियाली भी होती है, जल जहां होता 
 
है वहां शुद्ध वायु भी होती है। वायु और जल जीवन की परम् आवशयक्ता है। 
 
जल अल्प व संकोची तत्व है अगर भवन मे जल का स्थान ना हो तो ऐसा भवन 
 
बेकार है।पंच तत्वों में जल प्रमुख तत्व है। भवन व जीवन में  जल का महत्वपूर्ण स्थान 
 
है। जल ही जीवन है जल के बगैर सब शून्य है। भवन व जीवन का वहीं निवास 
 
होता है जहां जल होता है, जहां जल होता है वहीं हरियाली होती हैै जल जहां हो 
 
वहीं शुद्ध वायु भी होती है। वायु व जल जीवन की परम  आव’यक्ता है। जल 
 
अल्प और संकोची तत्व है। अगर भवन में जल का स्थान ना हो तों ऐसा भवन 
 
बेकार है। हम भवन वहीं बनातें हैं जहां जल होता है। जिस स्थान पर जल नहीं 
 
होता है वहां भवन बनानें की बात नहीं सोचते। भवन में जल की उपलब्धता कुएं, नलकूप, बोरिंग, भूमिगत जल की टंकी, छत पर -स्थित  जल की टंकी, या होदी आदि के रूप् मेंं हो सकती है। 
 
वर्तमान में कुए हौदी का प्रचलन खत्म हो गया है। हां गांवों मेंं आज भी पुराने  
 
कुुंए हैं। इनका पानी शुद्ध,ठंडा एवं ताजा रहता है क्यों कि कुओं कि गहराई 
 
ज्यादा होती है। कुआ जितना ही ज्यादा गहरा होगा, पानी उतना ही ज्यादा 
 
शुद्ध, ताजा, एवं ठंडा रहता है। साथ ही इस पानी में खनिज लवण भी भरपूर 
 
होतें हैं। यह हमारें स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक हैं। भवन के सम्मुख 
 
फव्वारा शुभ होता हैं।जल वास्तु का उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। पुराने समय में 
 
हमारें जल का प्रयोग आंतरिक उद्दे’यों जैसे खाना पकाना, पीनें आदि के काम 
 
में होता है। जबकि भूमि के ऊपर -स्थित  जल का उपयोग नहानें,धोने , 
 
कपड़ा साफ करनें, तथा अन्य उद्दे’यों के लिए किया जाता है। भूमिं के ऊपर -
 
स्थित  जल का मतलब तालाब, नदियां,झील आदि से हैं। जो लोग अमीर होते 
 
थे, वे अपने तालाबों में बत्तख, मछलियां आदि पालते थे। ये बत्तख और 
 
मछलिया मच्छरों के अण्डे खाकर मलेरिया जैसे रोगों पर तथा अन्य जल 
 
जनित रोगों पर लगाम लगाती थीं।प्राचीन काल में जल वास्तु का उपयोग तथा उनकी सुरक्षा के कई उदाहरण दिये जा सकतें हैं। गांवों में तालाब होता था जो काफी बड़ा व गहरा 
 
होता था। तालाब के पास मन्दिर होता था। यहां प्रत्येक साल मेला लगता था। 
 
गांव के लोग तालाब में घुसकर तालाब की मिट्टी निकालकर उस मिट्टी से 
 
देवी देवताओं की मूर्ति, खिलौने आदि बनातें थें। इस किया के द्वारा साल में 
 
एक बार तालाब की सफाई व खुदाई हो जाती थी। इस प्रकार मिट्टी निकालनें 
 
आगामी मानसून के समय से तालाब में  अधिक पानी भर जाता था। 
 
वास्तु के अनुसार भूमिगत जल के लिए ईतना क्षैत्र सर्वोतम है। अत: 
 
शुद्ध व समृद्ध जल की आपूर्ति के लिए ईतना ही क्षेत्र मेंं खुदाई करनी चाहिए। 
 
यहां का जल स्त्रोत काफी शुद्ध व पौष्टिक  होता है । वास्तुशास्त्र में  कहा 
 
गया है कि ईन  में जल स्त्रोत होनें से घर में  सुख व शान्ति आती है इससे 
 
धन, दौलत, समृद्धि, ज्ञान, वंश  की वृद्धि होती है। यहां जल स्त्रोत की 
 
व्यवस्था करते समय ध्यान रखे कि ईशान  व नैर्त्रत्य की धुरी प्रा -स्थित  ना हों। दाएं बाएं हो सकता है कुआ  उतर या पूर्व की ओर होना चाहिए। यह वायव्य या आग्नेय दिशा  में स्थित  न हों, इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए।  कुएं के बारे में वास्तुशास्त्र  के आचार्यो में महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार पूर्व में कुआ होने से समृद्धि आती है। उतर में  कुआ होनें से 
 
धन की वृद्धि होती है पश्चिम  में कुआ होने से मुस्किलो  व बाधाओं का 
 
सामना करना पड़ता है। अगर दक्षिण में  कुआ हो तो असामयिक मृत्यु होती 
 
है। अनेक विकृतिया आती हैं। घर के निवासी सदा परेशान  रहतें हैं। घरवालों के 
 
साथ  दुर्घटनांए घटित होती रहती हैं। प्राय: घर वाले डिप्रैशन  में रहतें हैं। 
 
आत्महत्या के विचार आतें हैं। घर में  कोई न कोई सदस्य गलत काम में 
 
फंस जाता है। बृहत्संहिता के अनुसार  पूर्व में कुआ होनें से धन व ज्ञान की 
 
वृद्धि होती है।  उतर में कुआ होने  से धन व ज्ञान की वृद्धि होती 
 
है। जबकि वायव्य के उत्तर में कुआं खोदनें से धन को लेकर आये दिन 
 
पारिवारिक कलह, झगडे़ और यहां तक कि मामले अदालतों में पहुंच जाते है। 
 
अगर कुआ वायव्य  में होता है, तो घर का मुखिया कर्ज में डूब 
 
जाता है । परिवार में बिखराव व तनाव आता है। गरीबी में दिन गुजारनें पड़तें 
 
हैं। अगर नैर्त्रत्य के किसी भी भाग के कुआं नहीं होना चाहिए। अगर नैर्त्रत्य के 
 
किसी भी भाग में दक्षिण या पश्चिम  में कुआ होतो यकीन मानें गृहस्वामी 
 
दिवालिया हो जायेगा। इतना ही नहीं, घर का मुखिया या बुजुर्ग अकाल मौत को 
 
प्राप्त होता है।अगर आग्नेंय के दक्षिण या पूर्व में कुआ होता है, तो घर में बच्चों से जुड़ी समस्याएं पैदा होती हैं। घर की आर्थिक -स्थिति  खराब होती है। इसके 
 
साथ साथ घर में अग्निकाण्ड की समस्या व चिन्ता बढ जाती है। परिवार के 
 
सदस्यों का एक दुसरें से मेल जोल या प्रेम भाव में कमी आती है। अग्नि भय 
 
का तो हमेशा  डर बना रहता है।याद रखें - ब्रहम् स्थान में भूलकर भी कुआं खुदवानें की चेष्ठा ना करें। अगर ब्रहम् स्थल में कुआं हो तो , उसे तुरन्त ढकवा देंं। ऐसा नहीं होनें से घर के 
 
निवासी धीरे धीरे मौत की ओर कदम बढ़ा देतें हैं। जिन्दगी पहाड़ सी बन जाती 
 
हैं। घर में मातम पसरा रहता है। मध्य में किसी भी प्रकार का गड्ढा नहीं होना 
 
चाहिए, हमेशा  याद रखें। आग्नेंय क्षेत्र में जल रखना शुभ नही होता। आग्नेंय में अग्नि का स्थान 
 
है। अग्नि सदा ऊपर उठती है। पानी नीचे की ओर बहता है। पानी भूमिं के गर्भ 
 
में  सामनें की चेष्ठा करता है अग्नि व जल परस्पर शत्रु हैं आग लगनें पर जल 
 
डाला जाता है। वायव्य क्षेत्र में वायु का स्थान है। वायु से मिलकर जल यहां सीलन पैदा 
 
करेगा। यहां मच्छरों की अधिकता हो जायेगी। परिणाम स्वरूप् मलेरिया व 
 
अन्य जल जनित रोगों का जोखिम बढ जाता है। अत: वायव्य में जल का 
 
स्थान नहीं होना चाहिए। अब नैर्त्रत्य की बात करतें हैं। यह पृथ्वी तत्व प्रधान क्षेत्र हैं। यह भूखण्ड 
 
का सबसे भारी क्षेत्र होता है। यहां छत पर जल टंकी रखना तो शुभ है, लेकिन 
 
भूतल पर जल स्त्रोत कभी नहीं होना चाहिए। क्या आप जल संकट से जूझ रहे  है? यदि हां तो इस समस्या के समाधान के लिए घर में बोरिंग करवाएं। वर्गाकार भूखण्ड में वर्गाकार हौदी या 
 
कुआं खोदना अच्छा हैं। हौदी की सफाई करते रहना चाहिए। भवन निर्माण से 
 
पूर्व ही भूखण्ड में कुआं खोदना अच्छा हैं। हौदी कर लेनी चाहिए। उसी पानी से 
 
निर्माण कार्य करवाना चाहिए। इस पर हम देखतें है कि जल वास्तु का उपयोग 
 
हमारे जीवन को सुखी व समृद्ध बनानें के लिए आव’यक है। जल के बगैर 
 
जीवन मुश्किल  है।

 

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