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फैंगसुई के सुनहरे नियम

भवन का प्रवेश द्वार अथवा दीवार पीछे की दीवार से ऊचाई में छोटी होनी 
चाहिए। भवन के सामनें नदी, नहर, समुन्द्र, झरना, घाटी या ढलान होना 
 
चाहिए। भवन के पीछे ऊँचा पर्वत, पठार या अन्य मकान की ऊँची दीवार होनी 
 
चाहिए। फैंगसुई कहता है कि अगर भवन ऐसी जगह स्थित हो तो आप बहुत 
 
जल्द अमीर बन सकतें हैं।भवन निर्माण के लिए कैसा भी भूखण्ड हो, वह समतल होना चाहिए। 
 
भूखण्ड की जमीन सड़क व राजमार्ग से पर्याप्त उठी होनी चाहिए। भवन ऐसी 
 
जगह बनाना चाहिये जहां जल निष्कासन की सुविधा मौजूद हो। 
 
मान ले कि आपका भवन ऊँची जमीन पर स्थित है, तो निवासियों का 
 
भाग्य बदल जायेगा और उस घर पर धन की वर्षा होगी, यदि भवन के सामनें 
 
मन्द गति से बहता जल नदी, झरना, या कोई झील हो । 
 
चीन में दक्षिण दिशा को अत्यधिक शुभ माना जाता है। चीनी फैंगसुई के 
 
अनुसार भवन बनातें समय दक्षिण दिशा में पर्याप्त जगह छोड़नी चाहिए। 
 
वास्तु शास्त्र इस बात की इजाजत नहीं देता है। दोनों देशों भारत व चीन की 
 
जलवायु में भिन्न्ता के कारण चीन में दक्षिण दिशा शुभ मानी जाती है। क्यों 
 
कि चीन में गर्मियों में जब दक्षिणी हवा चलती है, तो चीनी मकानों में स्वस्थ व 
 
ताजी हवा भर जाती है। और हमारे देश में अशुभ मानी जाती है। भारतीय वास्तु’शास्त्र दक्षिण दिशा में बन्द रखने के या वहां कम जगह छोड़नें की 
 
सलाह देता है। 
 
उतर या उतर पूर्व की ओर मुंह किया जाता हुआ चीनी मकान शुभ नहीं 
 
होता है। क्यों कि उतर दिशा में धूल भरी आंधी चलती है। यह आंधी मंगोलिया 
 
की रेत से आती है जिसमें बड़ी संख्या में मिट्टी सनी होती है। इस तरह से 
 
चीनी घर धूल मिट्टी से भर जाता है। 
 
त्रिकोण वाले मकान का द्वार भूखण्ड के मध्य में नहीं होना चाहिए। 'टी ' 
 
जंक्’ना के भवन का प्रवेश द्वार भी बीचों बीच नहीं होना चाहिए। 
 
फेंगसुई के अनुसार टी जंक्’ना या वाई जंक्’ना पर स्थित मकान अशुभ 
 
होता है। यहां दुर्घटनांए अक्सर होती हैं। 
 
अंतिम पक्तिं का आखिरी मकान जिसके बाद घना जंगल हो काफी 
 
अशुभ होता है। भवन का प्रवेश द्वार या दीवार पीछे की दीवार से ऊँचाई में 
 
छोटी होनी चाहिए। भवन के सामनें नदी, नहर, समुन्द्र, झरना, घाटी या ढलान 
 
होना चाहिए।  मैदान होना चाहिए। भवन के पीछे ऊँचा पर्वत, पठार या 
 
अन्य मकान की ऊँची दीवार होनी चाहिए। फैंगसुई कहता है कि अगर भवन 
 
ऐसी जगह पर -स्थित  हो तो आप बहुत जल्द अमीर बन सकतें है। यह एक 
 
श्रैष्ठ फैंगसुई की मिसाल है। आपकी शोहरत बुलन्दियों पर होगी। आपकी चारों 
 
तरफ जय जयकार होगी।फेंगसुई में वृक्षारोपण के नियम भी बताएं गए हैं। तात्पर्य यह है कि 
 
सुन्दर दिखे और भवन में उसका संतुलन स्थापित हो सके। भवन के आस पास 
 
में या चारदिवारी परिसर में जंगली पौधों को स्थान नहीं देना चाहिए। वृक्ष 
 
लगानें का एक मकसद यह भी होता है कि वह प्रदूषण से भवन तथा भवन के 
 
निवास करनें वाले लोगों की रक्षा कर सके। वृक्ष सघन भी नहीं होना चाहिए। 
 
खासकर भवन के आगे। अगर भवन के पीछे -स्थत हो तो ठीक है इसका 
 
तात्पर्य यह है कि सूर्य की रौशनी  भवन में पहुंच सके। अगर सघन वृक्ष होगा तो, 
 
प्राकृतिक रोशनी को रोक देगा। वृक्ष ज्यादा लम्बा भी नहीं होना चाहिए। छोटे 
 
छोटे पेड़ पौधे अच्छे होतें हैं। ये भवन के वातावरण को खुशनुमा बना देतें हैं। 
 
भवन के आगे फूलों की क्यारियां लगाई जा सकती है,
 
फेंगसुई कहता है कि कोई भी भूखण्ड आनन फानन में नहीं खरीदना 
 
चाहिए चाहे वह आवासीय मकान के लिए भूखण्ड हो। भवन व्यापारिक कार्यों 
 
के लिए भूखण्ड खरीदा जाना हो, सबसे पहले उसका सूक्ष्म निरीक्षण व  
 
अध्ययन करें। स्थान का निरीक्षण, प्यार्वरण का निरीक्षण वातावरण का ध्यान 
 
आदि बहुत महत्वपूर्ण हैं। भूखण्ड पर खड़े होकर खुली हवा में सास लें। इसकी 
 
अनुभूति करें। फिर भूखण्ड पर उगे पौधें का मुआयना करें। पौधे किस श्रैणी के 
 
हैं। उनकी जाति क्या है? क्या वे हरे भरें है, क्या वे सुखे सुखे है? फिर भूखण्ड 
 
पर या इसके आस पास रहनें वाले या चरनें वाले जानवरों पर नजर दौड़ाएं। वे 
 
क्या हरकतें करतें है? अब फैसला करें। यदि वातावरण ठीक लगे, रमणीक 
 
लगे, दिल व दिमाग का अच्छा लगता हो , तब ही भूखण्ड खरीदनें का फैसला करें। अन्यथा फैंगसुई की सलाह है कि उस भूखण्ड को त्याग देना चाहिए। 'एफ' 
 
की आकृति वालें भूखण्ड ने तो अच्छे में गिना जाता है और न ही बुरे में। चीनी 
 
मान्यता के अनुसार ऐसा भूखण्ड त्याजय है, क्यों कि यह गृह स्वामी को 
 
अवनति की ओर ले जाता है। 
 
उल्टा 'आई' की आकृति वाला भूखण्ड अच्छा होता है। चीनी विद्वानों का 
 
मानना है कि अगर उचित तरीके से ऐसे भूखण्ड में भवन का निर्माण करवाया 
 
जाए, तो बहुत जल्द गृहस्वामी मालामाल हो जाता है। इस तरह का मकान 
 
प्रगति का पर्याय बन जाता है। 
 
चीनी विद्वान पूर्व जन्म के कर्मो प्रा ज्यादा विशवास करते थें उनका 
 
मानना है कि व्यक्ति इस जीवन में जो कुछ भी भोगता है वह उसके पूर्व जन्म 
 
के कर्मो के अनुसार मिलता है उसके अनुसार इस जीवन में हमारा सब कुछ 
 
अच्छे से व्यतीत होता है तो, कुछ समय बुरा व्यतीत होता है। हमारे बहुत 
 
अच्छे समय में प्रतिकूल वास्तु हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाता। लेकिन जब 
 
समय खराब चल रहा हो तो यही प्रतिकूल वास्तु हमें उजाड़ कर रख देता है। 
 
चीनी दाशार्निक पांच वास्तु की श्रृंखला को मानते है जो व्यक्ति के जीवन का 
 
सबसे महत्वपूर्ण अविभाज्य अंग है। ये है, भाग्य अवसर, वास्तु, गुण या 
 
योग्यता, व -शिक्षा या अध्ययन। 
 
फैंगसुई में  छ भुजाओं वाली आकृति का भूखण्ड न शुभ होता है और नही 
 
अशुभ। फैंगसुई में कहा गया है कि कॉम-शिर्यल भूखण्ड के दो तिहाई भाग पर 
 
निर्माण यदि पूर्व या उतर दिक्षिण की ओर किया जाता है तो व्यक्ति को 
 
अच्छा खासा पैसा मिलता है। देखते ही देखते वह अमीर बन जाता हैं। उसका 
 
भाग्य चमकता है। लेकिन ऐसा निर्माण ईशान की तरफ किया जाता है तो 
 
व्यक्ति का नसीब रोता है। यदि व्यवसायिक लाभ के लिए चारों ओर से पर्वतों या पठार से घिरे 
 
भूखण्ड का खरीदा जाता है तो व्यक्ति को लाभ की बजाय घाटा होगा। इसमें 
 
कोई दो राय नहीं हैं। 
 
फैंगसुई के सुनहरें नियमों में एक महत्वपूर्ण नियम यह भी है कि दो 
 
भूखण्डों के मध्य छोटा सा भूखण्ड किसी भी प्रयोजन से नहीं खरीदना चाहिए। 
 
वास्तुशास्त्र का भी यही नियम है ऐसा भूखण्ड व्यापार में घाटा कराएगा और 
 
गृहस्वामी का दरिद्र बना देता है। फेंगसुई में व्यवसायिक भूखण्ड की अनिवार्य शर्ते बताई गई हैं। भूखण्ड 
 
ऐसा होना चाहिए, जो हो। यदि भूखण्ड हो तो उसका अनुपात हो,  तो 1 : 2 का 
 
होना चाहिए। भूखण्ड के पूर्वी दक्षिणी या नैर्त्रत्य कोण 90 डिग्री के होने चाहिए। 
 
तभी ऐसे व्यवसायिक भूखण्ड से लाभ कमाया जा सकता हैं। भूखण्ड तभी धन 
 
देगा, जब वह सब प्रकार से समतल हो। फेंगसुई के विद्वानों नें माना है कि घर में नुकीली वस्‍तुओं का हमेशा  
 
छुपाकर रखना चाहिए। जैसे कैंची, चाकू, हंसिया, आदि वे वैध दोष उत्पन्न 
 
करती हैं। चीनी मान्यता है कि हमारे आस पास के वातावरण हमारे शारिरीक 
 
स्वास्थ्य, चिन्तन तथा दिमागी संतुलन पर प्रभाव डालता है। उदाहरण के लिए 
 
बहुत तंग जमीन या उबड़ खाबड़ निर्माण में रहनें वाले व्यक्ति का मन 
 
मस्तिष्क भी तंग एवं विकृत हो जाता है।

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