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वास्तु में ऊँची जमीन का महत्व

।।वास्तु में ऊँची जमीन का महत्व।।
 
वास्तु में प्राकृतिक रूप् से उन्नत जमीन को श्रैष्ठ व उपयोगी माना जाता हैं। निचली जमीन में भराव 
 
करके ऊचा बनाया जाए, तो यह प्राकृतिक रूप् से उन्नत जमीन का मुकाबला नही कर सकेगा। हांलाकि 
 
यह जमीन भी वास्तु सम्पत होती है पर उसका उतना लाभ नही मिल पाता है।  निवासियों को। 
 
वर्तमान समय में निवास के लिए कौन सी जमीन श्रैष्ठ है और कौन सी जमीन बैकार है, यह 
 
पता लगाना बड़ा मु‍श्‍किल काम हो गया है। क्यों कि बिल्डराे और जमीन विक्रेताओं से निचली जमीन 
 
में भराव करके उसे उन्नत बनाकर बेचनें का काम किया है। आजकल यह सब काफी हो रहा है अगर 
 
आप प्लाट खरीदनें जाए , तो यह पता नहीं चल सकेगा कि जिस जमीन को आप खरीद रहें है, वह एक 
 
समय काफी गहरी जमीन थी और भराव करके उसे उन्नत बनाया गया है। ऐसी जमीन में आप वास्तु 
 
सम्पत मकान बनाकर निवास कर सकतें हैं। लेकिन इसका उस तरह से लाभ कतई नही मिल सकेगा, 
 
जिस तरह एक प्राकृतिक रूप् से उन्नत जमीन चाहे जैसी भी हो, अगर उसको वर्गकारा या आयताकार 
 
शक्ल देकर तथा उन्नत चौरस करके पूर्ण विधि - विधान के साथ वास्तु सम्मत ढ़ंग से मकान बनाया 
 
जाए तो निवासियों को सुख सम्पदा व धन का लाभ होता रहेगा। लेकिन किसी जमीन का इतिहास व 
 
वर्गीकरण पर भी वास्तु का जोर रहता है, जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं हैं। खासकर वर्तमान 
 
समय में चाहे वह भवन मालिक या भूखण्ड केता हो अथवा जमीन पर भवन बनानें की सलाह देनें वाले 
 
वास्तु शास्त्री हों, कोई भी इस पहलू को उठाना नहीं चाहता है। शायद इसलिए कि लोगों को इन सब बातों 
 
में यकीन नही रहा है। 
 
मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहता हॅू। इस जमानें में शादी ब्याह के लिए लड़का या लड़की 
 
का कुल खानदान देखा जाता था। केवल लड़का या लड़की योग्य है, सुन्दर व सुशिल है, सिर्फ इत्ना ही 
 
देखकर उनकी शादी कर दी जाती थी बल्कि लड़की या लड़के का संस्कार भी महत्वपूर्ण होता था और तब 
 
शादी के फैसले लिए जाते थे। हा¡लाकि आज भी लड़के या लड़की के संस्कार देखे जाते हैं, पर उसका 
 
लडका या लड़की के चयन में खास महत्व नहीं होता है। अगर लड़का कमाउ  व सुन्दर है तो ठीक है भले 
 
ही उसका संस्कार व पारिवारिक इतिहास खराब हो। इसी प्रकार लड़की पढ़ी लिखी है, आत्मनिर्भर है, सुन्दर 
 
है,भले ही उसका पारिवारिक इतिहास व संस्कार अच्छे ना हो, तो ऐसी लड़की से शादी करने के लिए 
 
लड़के के घर वाले तैयार हो जाते हैं। ऐसी शादियों का अन्जाम क्या होता है, यह सब बतानें की जरूरत 
 
नहीं है। भूमि क्रय करने  व भूमि पर मकान बनानें के मामले में वर्तमान में यही सब हो रहा है । '' 
 
भूखण्ड के संस्कार'' जानने की जहमत उठानें का कोई भी प्रयत्न  नही कर रहा है न तो भूखण्ड स्वामी, या 
 
भूखण्ड क्रेता, और न ही आज के वास्तु शास्त्री, जिनका ध्यान सिर्फ अपनी जेब भरनें का होता है। भूखण्ड
 
के 'संस्कार' के उपेक्षा करके ऐसी जमीन पर वास्तु सम्मत ढंग से मकान तो बना लिया जाता है, लेकिन 
 
इसका खामियाजा गृहस्वामी को अवश्य  भुगतना पड़ता है। 
 
आप बंगाल चले जाइये। वहा¡ भारी तादाद मे गड्ढे है, तालाब हैं,जिनमें मछली पालन का काम 
 
होता है।  बंगाल वासियों का प्रमुख भोजन मछली और भात है। हर बंगाली की यही इच्छा होती है कि 
 
उसके घर के सामनें एक गड़ढा या तालाब जरूर हो जिसमें मछली पालन हो सके। आजकल -बिल्डर्स
 
ऐसी निचली, गड्ढे वाली जमीनों को सस्ते दामों मे खरीद कर उसका भराव कर रहें हैं। ताकि उस प्रकार 
 
की जमीनों को ऊँचा करके भवन निर्माण के लिए उसको लोगो  को बेचा जा सके। ऐसी कृत्रिम भराव 
 
वाली जमींने बिक भी रही हैं। बिल्डर्स खूब मूनाफा वसूली कर रहें है दूसरी ओर एक भयानक बात यह 
 
भी है कि ऐसी जमीनों पर मकान बनाकर निवासी रह तो रहें हैं। लेकिन वे सुखी नही हैं। वे हमेशा  
 
समस्याओं से घिरे रहतें हैं। दुख: व परेशांनाी झेलनें के लिए मजबूर हैं । हालाकिं वास्तु लिहाज से उनका 
 
मकान अनुकूल होता हैं, पर भूखण्ड के संस्कार के दोष के कारण उनके जीवन में समस्याओं का अंबार 
 
लगा रहता है। रोग, बिमारी,गृह कलेश , आय से ज्यादा व्यय, दुशमनी, पारिवारिक, असंतुलन,आदि। इन 
 
समस्याओं के पीछे 'जल' ही जिम्मेवार होता है। कृत्रिम रूप से भरी गई जमीन तथा उस पर बने मकान 
 
में निवासियों को विरले ही शुद्ध पेयजल का लाभ मिलता हो।
 
इसका प्रमुख उदाहरण है कोलकाता का सार्क लेक एरिया। 
 
किसी समय यहां खारे पानी की झील हुआ करती थी। उसको पाट करके इस पर कॉलोनी बसायी 
 
गई थी। आज साल्ट लेक सिटी कोलकाता का सबसे सुन्दर रिहायशी  इलाका माना जाता है। दूसरी ओर 
 
यह भी सच है कि यहां का जल स्त्रोत काफी खारा है। अर्थात यहां का पानी पीने योग्य नहीं है। यहां के 
 
लोग कोलकाता नगर निगम का पानी पीनें के लिए मजबूर हैं। अगर कोई व्यक्ति अपनें मकान के बारे 
 
में करवाए भी तो उसे खारा पानी ही नसीब होगा। ऐसा क्यों? क्यों कि भूखण्ड का संस्कार ही गलत है। 
 
ऐसी जमीनों के बारे में वास्तु शास्त्रियों की राय है कि निचली जमीनों को कृत्रम रूप् से ऊँचा उठाकर 
 
भले ही वास्तु सम्मत बना लिया जाये, लेकिन निवासियों को हमेश जल संकट का सामना करने के लिए 
 
तैयार रहना होगा। खासकर पीनें के पानी के मामले को लेकर। कुछ लोग सोच रहें होंगे कि ऐसी कृत्रिम 
 
भराव वाली जगहों पर पानी का लेवल कम गहराई पर ही मिल जाता है,फिर जल संकट काहे का? यह 
 
सच भी है लेकिन यह भी सच है कि हमेशा  पानी पीनें योग्य नहीं होता है। नल खोदनें पर पानी तो 
 
जल्दी ही मिल जायेगा पर क्या आप यह पानी पीकर जिन्दा रह पायेंगें? 
 
वास्तु मे कहा गया है कि नीचली जमीन से निकला पानी खारा व भारी होता है। यह स्वास्थ्य के 
 
लिए काफी हानिकारक होता है। इसके विपरित प्राकृतिक रूप् से जमीन से निकला पानी उन्नत
 
स्वादिष्ट,स्वास्थ्यवर्धक व पीनें योग्य होता है। मध्य प्रदेश  में एक शहर है रायपुर, यहां रायपुर मे 
 
एम.जी.सी रोड काफी ऊँची जमीन पर -स्थित  है, इस पर बसे लोग काफी सुखी व सम्पन्न हैं। उनका 
 
स्वास्थ्य काफी अच्छा है । क्यों कि यहां घर घर में मीठा पानी आता है, यहां कही भी खुदाई कर ले 
 
,मीठा पानी ही निकलेगा। क्यों कि यह क्षैत्र प्राकृतिक रूप् से उन्नत है। यह भी कहा जा सकता है कि 
 
यहां कि भूमि के संस्कार काफी अच्छे हैं। नल की खुदाई पर करीब 12 फुट के पछचात् कठोर पत्थर 
 
निकलता या वास्तुशास्त्र  कहता है कि पाषाण को तोड़कर निकाला हुआ जल निर्मल व पवित्र होता है। 
 
जल ही जीवन है, शुद्ध जल से प्यास बुझती हैं,आत्मा तृप्त होती है, दूषित जल के सेवन से 
 
बिमारियां पैदा होती है। अत: भवन बनाते समय भूखण्ड का चयन करते समय उस भूखण्ड की ऊचाई  
 
निचाई का अवशय  ध्यान रखना चाहिए। इसके पश्चात् हवा का बहाव देखना भी जरूरी होता हैं। हवा का 
 
बहाव व दिशा भी भवन या भूखण्ड की ऊचाई  निचाई का अव’य ख्याल रखना चाहिए। इसके पशचात् 
 
हवा का बहाव देखना भी जरूरी होता है। हवा का बहाव व दिशा  भी भवन या भूखण्ड की ऊँचाई से 
 
अनुप्रमाणित होती है। 
 
अब यह प्रश्न  उठता है कि अगर घर बनानें के लिए प्राकृतिक रूप से ऊँची जमीन ना मिले, तो 
 
क्या करना चाहिए? क्या गृह निर्माण का विचार त्याग देना चाहिए अगर गृह निर्माण के लिए खड्डे वाली 
 
जमीन मिलती है, तो क्या उस भूखण्ड को क्रय नही करना चाहिए? वर्तमान समय में यह प्र’न 
 
अव्यवहारिक लगता हैं। क्यों कि आसमान छूती महंगाई बढ़ती आबादी, घटते भूखण्ड के बीच अगर कोई 
 
व्यक्ति प्राकृतिक रूप् से उन्नत भूखण्ड की तुलना  करता फिरे, तो यह शायद सम्भव ना हो और यदि 
 
सम्भव हुआ तो भी उसमें कई प्रकार की दिक्कतें आ सकती हैं। अत्: व्यवहारिक बात यह है कि जैसा 
 
भी भूखण्ड मिले उसे क्रय कर लेना चाहिए। अगर भूखण्ड काफी नीचा हो तो उसको ऊँचा बनाया जा 
 
सकता है। वास्तु शास्त्र कहता है कि गृह निर्माण से पूर्व भूखण्ड में वास्तु सम्मत तरीके से भराव किया 
 
जाए, फिर भूखण्ड को आयताकार अथवा वर्गाकार, चौराहा बनाकर ही उस पर भवन निर्माण किया जाए। 
 
किसी जमीन को या भवन को वास्तु सम्मत बनानें के लिए अथवा यह पता या परीक्षण करनें के 
 
लिए कि क्या यह भूखण्ड वास्तु सम्मत है, जिस पर भवन निर्माण किया जाना है? सबसे पहले यह पता 
 
लगाएंं कि वह भूखण्ड बरसात में पानी डूबता तो नहीं हैं? यदि भूखण्ड पानी मेें डूब जाता है तो वह वास्तु 
 
सम्मत नहीें हो सकता। ऐसी जमीन या भूखण्ड को वास्तु सम्मत बनानें के लिए उस पर मिट्टी डाल 
 
कर भराव किया जाना चाहिए। जब बरसात खत्म हो , तब ही आप ऐसा करें अन्यथा बरसात में भूखण्ड 
 
की मिट्टी बह जायेगी। भराव करनें के पश्चात  भूखण्ड  के लेवल  ऊँचा करनें के बाद कुछ सालों तक 
 
जमीन को खाली छोड़ देना चाहिए। इसका लाभ यह होगा कि भूखण्ड बरसात का पानी पी पीकर ठोस हो 
 
जायेगा। फिर निर्माण शुरू होनें से पूर्व इस पर रोलर चलवा दें।

 

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