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आयु-मृत्यु संबंधी प्रमुख फलित सूत्र

यहां जातक की आयु एवं मृत्यु के सम्बन्ध में बताने वाले कुछ प्रमुख सूत्रों की चर्चा करेगें। (पीछे भावेषों के विभिन्न भावों में तथा विभिन्न ग्रहों से युतियों के बारे में प्रमुख सूत्र हमने बताए हैं और उनका कन्सट्रेषन रोगों पर विषेश रूप से रखा है। यंहा मृत्यु के सम्बन्ध में आयु निर्णय के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख फलित सूत्र दे रहे है)-

• लग्नेष व अश्टमेष का म्ग्ब्भ्।छळम् हो, दोनों पर पापग्रहों का प्रभाव हो तथा चन्द्र, सूर्य व षनि छठे भाव में हो तो जातक का अतिषीघ्र मरण होता है।
• वृषिचक लग्न में सूर्य लग्नस्थ हो, गुरू विभाजित हो, अश्टमेष केन्द्र में हो और चन्द्र व राहू 7 या 8 भाव में हो तो जातक अल्पायु होता है।
• अश्टमेष मंगल के साथ लग्नस्थ हा अथवा अश्टमेष सिथर राषि के साथ लग्नआठवेंबारहवें भाव में हो तो जातक की मृत्यु युवावस्था में ही हो जाती है।
• अश्टमेष नीच राषि में हो, पापग्रह अश्टमस्थ हो, लग्नेष निर्बल हो तो भी अल्पायु योग बनता है।
• बुध या गुरू लग्नेष हो, लग्न में षनि हो तथा द्वादषेष तथा अश्टमेष निर्बल हो तो जातक अल्पायु होता है। ( बुध या गुरू लग्नेष का अर्थ है लग्न-मिथुन, कन्या, धनु, या मीन का हो तो)।
• अश्टमेष अश्टम भाव तथा लग्नेष तीनों ही पापाक्रांत हों तथा 12 वां भाव भी पापग्रह से युक्त हो तो जातक की मृत्यु जन्म के उपरांत ही हो जाती है।
• अश्टमेष अश्टम भाव मेंस्वग्रही हो, चन्द्रमा पापग्रह से युत और षुभ दृशिट से हीन हो तो जातक की आयु एक महीना ही होती है।
• राहू या केतु के साथ सूर्य सातवें, षुक्र आठवें व पापग्रह लग्न में हो तो जातक की मृत्यु जेल में होती है।
• सिंह राषि का षनि पंचमस्थ हो, मंगल अश्टमस्थ हो और चन्द्रमा नवमस्थ हो तो जातक की मृत्यु बिजली के झटके से या मकान के मलबे के नीचे दबकर अथवा पेड़ से गिरकरऊंचार्इ से गिरकर होती है।
• सूर्य व चन्द्र कन्या राषि में अश्टमस्थ हों तो जातक की मृत्यु विश के कारण होती है।
• सूर्य व मंगल चतुर्थस्थ, षनि दषमस्थ तथा अश्टम भाव पापाक्रांत हो तो जातक की मौत फांसी से होती है।
• राहू दृश्ट चन्द्र व मंगल अश्टमस्थ हों तो बाल्यावस्था में ही जातक को माता सहित मर जाना पड़ता है।
• अश्टमस्थ षनि यदि क्षीण चन्द्र व उच्च के मंगल से दृश्ट हो तो भंगदर, पथरी या कैंसर जैसे रोग तथा आपरेषन के कारण जातक की मृत्यु होती है।
• षनि व चन्द्र छठे या 8वें भाव में पाप मध्य होंपाप दृश्ट हों तथा अश्टमेष स्वग्रही होकर पापमध्य या पाप दृश्ट हो तो जातक की मृत्यु समुह में होती है।
• लग्नेष व अश्टमेष पापग्रह से युत या दृश्ट होकर 6ठें भाव में हो तो जातक की मौत लड़ार्इ-झगड़े में होती है।
• मंगल व षनि छठे भाव में हो और लग्नेष सूर्य व राहू से दृश्ट होकर 8वें भाव में हो तो क्षय रोग से मृत्यु होती है।
• मंगल व चन्द्र 6ठें व 8वें भाव में हो तो जातक षस्त्र, रोग, अगिन, कंरट या गोली से मरता है।
• षनि व चन्द्रमा 6ठें व 8वें भाव में होतो जातक वायुविकार या पत्थर की चोट से मरता है।
• सिंह लग्न में निबल चन्द्र अश्टमस्थ हो तथा षनि की युति हो तो प्रेत-बाधा, षत्रुकृत अभिचार से पीड़ा तथा अकाल मृत्यु का परिणाम जातक भोगता है।
• सिंह लग्न हो, सूर्य व षनि का म्ग्ब्भ्।छळम् हो, षुभग्रहों की दृशिट न हो तो 12 वर्श की आयु में मृत्यु होती है।
• लग्न में सिंह राषि का सूर्य हो, पापग्रहों के मध्य सूर्य हो (12वें व दूसरे भाव में पापग्रह हों) तथा लग्न में षत्रु ग्रह (राहू, षनि, षुक्र) की युति हो तो जातक अस्त्र-षस्त्र या विस्फोटक सामग्री से प्राय: 47 वर्श में मरता है।
• लग्नेष सूर्य तथा लग्न पापग्रहों के बीच हों 7वें भाव में कुम्भ राषि का षनि हो और चन्द्र निर्बल हो तो जातक आत्महत्या करता है।
• भाग्य स्थान में मेश का गुरू तथा अश्टम भाव में मीन का मंगल हो यानी म्ग्ब्भ्।छळम् हो तो भी जातक की मृत्यु 12 वर्श की अवस्था में ही होती है।
• द्वितिय व द्वादष भाव पापग्रहो से युत हो, सूर्य लग्नेष होकर निर्बल हो 1, 2 व 12 भाव षुभ ग्रहों से दृश्ट न हों तो जातक 32वें वर्श में मर जाता है।
• दुसरे भाव में कन्या राषि का राहू हो तथा षुक्र व सूर्य से युति करे, किन्तु षुभ ग्रहों से दृश्ट न हो तो जातक युवा होतर पिता को मारे, व खुद मरे।
• चन्द्रमा 5,7,9,8 तथा लग्न में पापग्रह से युत हो तो 'बालारिश्ट रोग' बनाता है। जिसमें जातक की मृत्यु बाल्यकाल में ही हो जाती है। (यदि किसी अन्य योग से उसका निराकरण न हो रहा हो तो)
• लग्नेष केन्द्र में दो पापग्रहों के साथ हो तथा अश्टम भाव खाली न हो तो âदय गति रूकने से मौत हो जाती है।
• कर्क लग्न में निर्बल चन्द्र अश्टमस्थ होकर षनि से युत करे तो प्रेतबाधा या षत्रुओं से पीडि़त होकर जातक अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है।
• लग्नेष व चन्द्र लग्न दोनों पाप प्रभावपाप मध्य में हो, सप्तम में भी पापग्रह हों और सूर्य निर्बल हो तो जातक जीवन से निराष होकर आत्महत्या करता है।
• तुला का सूर्य चौथे, कुम्भ का गुरू आठवें, मिथुन का चन्द्र 12वें हो तथा चन्द्र पर षुभ दृशिट न हो तो जातक जन्म लेते ही मर जाता है।
• द्वितिय द्वादष भाव में पापग्रह हों (लग्न पापमध्य हो), चन्द्रमा लग्नेष होकर निर्बल हो तथा 1, 2, 12 भावों पर षुभ दृशिट न हों तो भी 32 वें वर्श में मृत्यु होती है।
• कर्क लग्न हों तथा दु:स्थानों में चन्द्र, षनि षुक्र की युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
• सूर्य पांचवे भाव में वृषिचक राषि का हो तथा दो पाप ग्रहों के मध्य हो और चन्द्र निर्बल हो तो हार्ट अटैक के कारण जातक की मृत्यु होती है।
• चन्द्र, मंगल षनि तीनों दु:स्थानो में एकसाथ हो और लग्न मेश में हो तो वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
• वृश लग्न में सूर्य, गुरू, षुक्र की युति एकसाथ दु:स्थानो में हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
• कन्या लग्न हों, चन्द्र अश्टमस्थ हो तथा बुध, सूर्य, मंगल आदि किसी भी भाव में इकÎे हो जाएं तो जातक की मृृत्यु ब्लडप्रेषर से होती है।
• कन्या लग्न में बुध, गुरू व मंगल की युति एकसाथ दु:स्थानो में हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
• धनु लग्न हो चन्द्र सप्तमस्थ मंगल, राहू के साथ और षुभ ग्रहदृशिट न हो तो जातक जन्मते ही मर जाता है।
• गुरू लग्नेष होकर वृषिचक राषि में हो और मंगल धनु राषि में हो तो जातक की मृत्यु 12 वर्श में होती है।
• वृषिचक राषि में चन्द्र, षुक्र की युति दु:स्थानों में हो और लग्न हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है।
• लग्नेष व चतुर्थेष होकर गुरू मकर राषि में हो तथा निर्बल या अस्त हो तो हार्ट अटैक से मृत्यु होती है। या सूर्य वृषिचक का दो पाप ग्रहों के मध्य 12 वें भाव में हो तो हार्ट अटैक के कारण जातक की मृत्यु होती है।
• मीन लग्न में अश्टमस्थ षनि के साथ निर्बल चन्द्र हो तो प्रेतबाधा सेअकाल मृत्यु होती है।
• लग्नेष गुरू व लग्न दोनों पाप ग्रहों के बीच हो, 7वे भाव मेंं कन्या राषि में भी पापग्रह हो और सूर्य निर्बल हो तो जातक आत्महत्या का विवष होता है।
• 7 वें भाव में कन्या राषि का चन्द्र मंगल व राहु से युति करता हो और षुभ ग्रह की दृशिट न हो तो जातक की मृत्यु एक वर्श में होती है।
• 7वें भाव में कन्या राषि का षनि हो तथा 12वें भाव में मेश राषि का षुक्र व राहु लग्नेष के साथ हो तो भी जातक की मृत्यु एक वर्श में हो जाती है।
• मीन लग्न में बुध, गुरू, षुक्र की युति एकसाथ दु:स्थानो में हो तो भी वाहन दुर्घटना में मृत्यु होती है।
• तुला लग्न में निर्बल चन्द्र 8वें भाव में षनि के साथ हो तो षत्रु के अभिचार या प्रेतबाधा के कारण जातक की मृत्यु होती है। अथवा षुक्र व लग्न दोनों पापग्रहों के साथ व षनि 7वें हो तो षत्रु के अभिचार या देवषाप से मृत्यु होती है।
• तुला लग्न में गुरू, षुक्र व षनि की दु:स्थानों में युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
• मकर लग्न में लग्नेष व लग्न पापग्रहों के मध्य हों, सप्तम भाव में भी पाप ग्रह हो तो जातक जीवन से निराष होकर आत्महत्या करता है।
• मकर लग्नस्थ सूर्य, मंगल, गुरू, राहू व चन्द्र एकसाथ हों तो भी षीघ्र मृत्यु होती है।
• चतुर्थेष मंगल 12वें हो, सप्तम भाव में कर्क का षनि हो, सप्तेष चन्द्र अश्टमस्थ हो तो 14वें वर्श में विमान दुर्घटना में मृत्यु सम्भावित होती है।
• मकर लग्न हा सूर्य, मंगल, व षनि दु:स्थानों में एकसाथ युति हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
• कुंभ लग्न में लग्नेष व लग्न दोनों पापग्रहों के बीच हों, सूर्य निर्बल व सप्तम भाव में भी पापग्रह हो तो जातक आत्महत्या करता है।
• कुंभ लग्न में बुध, षुक्र, षनि की युति दु:स्थानों में एकसाथ हो तो वाहन दुर्घटना में जातक की मृत्यु होती है।
• निर्बल चन्द्र षनि के साथ मेश राषि में अश्टमस्थ हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है।
• बुंध व लग्न पापग्रहों के बीच तथा सातवें भाव में मीन राषि में पापग्रह और सूर्य निर्बल हो तो जातक आत्महत्या करता है।
• सूर्य, मंगल, षनि अश्टम भाव में मेश राषि में हो, षुभ ग्रहों से दृश्ट न हों तो जातक की एक वर्श में मृत्यु हो जाती है।

दीर्घायु :-

लग्नेष व अश्टमेष चर राषि में हों। अथवा दोनो मे से एक चर राषि में और दूसरा द्विस्वभाव राषि में हो तो जातक पूर्णायुदीघायु होता है। क्रमष: 90-100, 66-90 वर्श आदि।

अल्पायु :-

लग्नेष व अश्टमेष सिथर राषि में हों। अथवा दोनो मे से एक सिथर राषि में और दूसरा द्विस्वभाव राषि में हो तो जातक अल्पायु होता है। पहले में 20 वर्श से कम, दूसरे में 33 वर्श से कम।

मध्यायु :-

लग्नेष व अश्टमेष द्विस्वभाव राषि में हों। अथवा दोनो मे से एक द्विस्वभाव राषि में और दूसरा चर राषि में हो तो जातक मध्यायु होता है। क्रमष: 66 वर्श तक, या 50 के आसपास।

विषेश :-

तीनों विशयों में दो-दो सिथतियां है, अत: क्रमष: दो-दो आयु मान दिये गये है। तीसरे नियम की दूसरी सिथति में पाठक भ्रमित हो सकते है। क्योकि वह पहले दो नियमों की दुसरी सिथति में मेल खाती है। अत: अनिवार्यता रूप से लग्नेष को विचारे। पूर्णायु में लग्नेष का चर में, अल्पायु में लग्नेष का सिथर में, तथा मध्यायु में लग्नेष का द्विस्वभाव राषि में होना अनिवार्य है। फिर अश्टमेष को देखे।

अतिविषेश :-

सटीक परिणाम प्रापित के लिए लग्न व चन्द्रकुंडली तथा लग्न व होरा कुंडली में तुलना करनी चाहिए।

मेरे सुयोग्य आचार्य श्री मदनमोहन कौषिक के अनुसार यदि अश्टम भाव में चर राषि हो तो जातक की मृत्यु चलते-फिरते होती है। यदि सिथर राषि में हो तों जातक पंलग या अस्पताल में हफतोंमहीनों पड़ा रहने के बाद मरता है। द्विस्वभाव राषि में मृत्यु से दो एक दिन पूर्व या कुछ ही घटें पूर्व पंलग पर लेटता है। यदि अश्टमेष भी चर, सिथर या द्विस्वभाव राषि में हो तो फल षत-प्रतिषत निषिचत हो जाता है। ( अश्टमेष व अश्टम दानों चर राषि में हो तो डाक्टर तक पहुंचन की नौबत तक नही आती। जातक कामबात करते-करते तुंरत मर जाता है।) इसी प्रकार छठे भाव में चर राषि हो तो रोग आते जाते रहते है। (जातक कम बिमार पड़ता है परन्तु षीघ्र ठीक हो जाता है।) सिथर राषि हो तो रोग आने के बाद जाता नही (गुरू की दृशिट न हो तो आजीवन रहता है), द्विस्वभाव राषि में कश्टयाध्य या कठिनार्इ से ठीक होता है।

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